Sunday, 11 October 2020

क्या 'राम' का 'चिराग' अपना भाग्य चमकाएगा

 74 वर्षीय 'रामविलास पासवान' पिछले कुछ समय से बीमार चल रहे थे, 22 अगस्त को 'फोर्टिस अस्पताल' में भर्ती हुए, 3. अक्टूबर को दिल का ऑपरेशन किया गया, उनकी स्थिति सुधरने लगी थी, जिसके बाद उनकी एक और सर्जरी अभी बाकी थी। लेकिन 8,अक्टूबर, गुरुवार की शाम उनकी तबीयत अचानक खराब हो गई और डॉक्टरों की तमाम कोशिशों के बाद भी उन्हें नहीं बचाया जा सका।

राम विलास पासवान जी का जन्म आजादी के एक साल पहले 5, जुलाई 1946 में 'खगड़िया' के एक छोटे से गांव 'शहरबन्नी' मैं हुआ। 1983 में पासवान जी ने दलितों के उत्थान के लिए दलित सेना का संगठन खड़ा किया, जिस वजह से वह राष्ट्रीय राजनीति पर छा जाने वाले दलित राजनीति के सबसे लोकप्रिय चेहरा बन गए।
'गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड' में अपना नाम दर्ज करा चुके, रामविलास पासवान के नाम छे प्रधानमंत्रियों के मंत्री मंडल में काम करने का रिकॉर्ड भी दर्ज हैं।
1989 रामविलास जी पहली बार हाजीपुर से JD(NF) से जीते और प्रधानमंत्री 'विश्वनाथ प्रताप सिंह' की कैबिनेट में केंद्रीय 'श्रम' और 'कल्याण' मंत्री बने। फिर
(2). JD(U) से पीएम इंद्र कुमार गुजराल,(3). JD(U) से पीएम एचडी देवगौड़ा, (4). NDA से पीएम अटल बिहारी वाजपेई (5). UPA से पीएम डॉ.मनमोहन सिंह और फिर (6). NDA से पीएम नरेंद्र मोदी की कैबिनेट में केंद्रीय 'उपभोक्ता मामले','खाद्य' और 'सार्वजनिक वितरण प्रणाली' मंत्री रहे।
इसमें कोई शक नहीं, की रामविलास पासवान भाग्य के बड़े बलशाली थे, वो छे 'प्रधानमंत्रियों' के कार्यकाल में बतोर कैबिनेट मिनिस्टर रहे। मगर यही बात जब उनके बेटे 'चिराग पासवान' से एक इंटरव्यू के दौरान कही गई, तो उन्होंने इससे साफ इंकार कर दिया, चिराग ने कहा कि वह भाग्यशाली नहीं थे, कि वो 6 प्रधानमंत्रियों के कार्यकाल में बतोर कैबिनेट मिनिस्टर रहे, बल्कि वो जिस-जिस पार्टियों से जुड़ते थे, वह पार्टियां मेरे पिता के भाग्य से जीत जाती थी, तब जाकर वह उनके कार्यकाल में कैबिनेट मिनिस्टर बनते थे।
आपको बता दें बिहार चुनाव में इस बार चिराग पासवान की पार्टी 'लोक जनशक्ति पार्टी' (LJP) का गठबंधन BJP से है, हालांकि BJP का गठबंधन JDU से भी है। मगर चिराग अपने सारे उम्मीदवार JDU के विपक्ष में उतारेंगे।
अब ऐसे में दो बड़े सवाल उठते है, 'पहला' -क्या बिहार की जनता चिराग के पिता 'रामविलास पासवान' के देहांत की सहानुभूति चिराग को 'वोट' डाल कर देगी।
'दूसरा' -पिता के देहांत के बाद, क्या चिराग उनके भाग्य की गरिमा को कायम रख पाएंगे, क्या उसे ओर आगे तक बढ़ाएंगे या फिर फेल हो जाएंगे।
फिलहाल तो इन सवालों के जवाब परिणामों की घोषणा के बाद ही पता चल पाएंगे। तब तक के लिए 'चिराग पासवान' और उनके परिवार को हमारा ढेर सारा प्यार।

नमस्कार, राहुल सिंह द्वारा

Saturday, 10 October 2020

वो कैमरे वाला लड़का

जमीन पर बैठकर दाहिने हाथ की पहली अंगुली से माटी को कुरेदती रहती, वो लड़की मैहेज तीन साल की थी, चेहरे का रंग सावला, और बदन पर आधे कपड़े। मेरी उम्र भी कोई ज्यादा नहीं थी, मैं पाँच साल का था। उघारे बदन पर सिर्फ जांगिया पहने नंगे पांव खड़े होकर, उसकी इस हरकत को टकटकी लगाए देखता, हर रोज अंग्रेज के बड़े अधिकारी आते, उस लड़की को लात मारते और मुझसे अंग्रेजी के दो,तीन बोल बोल जाते "hey you, take care of her, she is your wife, you are married" उनकी ये अंग्रेजी मुझे खूब भली-बुरी लगती। एक दिन गांव के 'रामू काका' जो उनकी अंग्रेजी समझते थे, उन्होंने मुझे बताया 'कि तुम और ये लड़की दोनों शादीशुदा हो, तुम्हें इसका ख्याल रखना है, वरना यह अंग्रेज इसे परेशान करेंगे' मुझे 'शादीशुदा' का अर्थ उतना तो नहीं मालूम था, मगर ख्याल रखना है, यह बात मैंने गाठ बांध ली थी। खेलने-कूदने की उम्र में मेरे माथे पर उस लड़की की जिम्मेदारी आ गई थी, अब मैं भी उसकी खुशी के लिए उसके साथ जमीन पर बैठकर अंगुली से माटी को कुरेदा करता।

1961 मैं हमारी शादी कागजों में गढकर पक्की कर दी गई। मेरी उम्र 21 बरस हो चुकी थी, उस लड़की को मैंने अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार कर लिया था। अब रोजगार की उम्मीद में हम युपी से दिल्ली की ओर चल पड़े। दिल्ली में यमुना किनारे हमारा बसेरा था। चार पहियों वाले ठेले पर मैं सेब, अनार, और केले बेचा करता। जिंदगी का पहिया धीमे-धीमे बढ़ रहा था, हमारे दो बच्चे हो चुके थे, वो जवान हो रहे थे और हम अब ढल रहे थे। चार पहियों वाली फल की ठेली से अपने परिवार का गुजारा कर पाना मुश्किल हो रहा था। 50 साल की उम्र में मैंने अब अपना एक ढाबा खोला जिसका नाम मैंने 'बाबा का ढाबा' रखा। जिंदगी का ढाबा धीमे-धीमे चल रहा था, दिन तेजी से घट रहे थे, उम्र तेजी से घठ रही थी, दाढ़ी, मूंछ और सर के बाल भी सफेद हो चुके थे, मगर ढाबे की गति अब भी धीमी थी। मेरी उम्र अब 80 बरस हो चुकी थी और एक दिन मैं अपने ढाबे पर रोटियां सेक रहा था, कि तभी एक अमीर घराने का लड़का हाथों में कैमरा लिए वही अंग्रेजी के बोल बोलते हुए मेरे ढाबे के पास आया और मेरे ढाबे के पकवानों को 'अंग्रेजी के शब्दो में गुनगुनाते' हुए फिल्मआने लगा, मैंने उससे कहा 'बेटा अगर हिंदी में बोलोगे तो मैं भी समझ पाऊंगा', उसने दोबारा से हिंदी में बोलकर मेरे पकवानों को फिल्मआना शुरू किया, मेरी आंखों में आंसू आ गए।

अगले ही दिन जब मैं दोबारा अपने ढाबे की ओर चला तो दूर से देखा मेरे ढाबे के पास करिब सौ लोगों की भीड़ जुटी थी, मुझे लगा कोई दुर्घटना हुई है, मगर जब मैं करीब पहुंचा तो वह सब मुझसे कहने लगे "अरे बाबा, जल्दी खोलिए ढाबा, बड़ी तेज की भूख लगी है" 'खोलिए', 'खोलिए'...! मेरे चेहरे पर हल्की सी मुस्कुराहट थी और आंखों में आंसू मैंने झट से कहा "हां,हां, अभी खोलता हूं बेटा"। उस 'कैमरे वाले लड़के' ने मेरी जिंदगी बदल दी।
जिंदगी में सफलता आपको एक ना एक दिन जरूर मिलेगी चाहे 30 साल में मिले, 50 में, 70 में या मेरी तरह 80 साल की उम्र में, बशर्ते आपको उम्मीद और मेहनत करना नहीं छोड़ना है।

अंत में यह सुनकर मैंने अपना कैमरा बंद किया और बाबा का शुक्रियाअदा किया कि उन्होंने अपनी जीवन की इतनी खूबसूरत दास्तां हमें सुनाईं, मैं चलने के लिए जब खड़ा हुआ तो अचानक मेरी नजर 'अम्मा' पर पड़ी, मैंने देखा वो कसी सोच में खोई हुई है और उनके दाहिने हाथ की पहली उंगली वहीं जमीन को कुरेदने में लगी हुई है, मैं मन ही मन मुस्कुराया और वहां से चल पड़ा।

राहुल सिंह द्वारा

Friday, 9 October 2020

ये फिर कहीं बदले की आग तो नहीं

 मुंबई के पुलिस कमिश्नर 'परमवीर सिंह' और उनकी टीम को मैं बधाई देना चाहूंगा, कि उनकी नींद केवल तब जाकर खुली जब 'रिपब्लिक भारत' चैनल तीन, चार हफ्तों से TRP में टॉप पर रहने लगा। आश्चर्य मुझे इस बात का है, कि इस तरह का मामला इससे पहले कहीं देखने को नहीं मिला, जब 'आज तक' या अन्य चैनल TRP में टॉप पर रहते थे। मगर नहीं-नहीं ये बदले की आग तो नहीं हो सकती। मगर जब मैं फिर गहराई से सोचता हूं, कि क्या केवल मुंबई के कुछ घरों के सेटअप बॉक्स में TRP डिवाइस को लगाने से और उनको पाँच सौ रुपये देकर 'रिपब्लिक चैनल' चला कर रखने से क्या रिपब्लिक चैनल नंबर वन पर आ सकता है। हमें जरा गौर फरमाना होगा TRP केवल एक राज्य के कैलकुलेशन से नहीं आती, बल्कि ये पूरे भारतवर्ष में करीब चालीस हजार घरों मे लगाकर की जाती है। अब कोई अगर ये कहेगा कि अर्नब गोस्वामी ने अपना चैनल छोड़कर पूरे भारतवर्ष में पाँच-पाँच सौ रुपये बटवाए होंगे, तो यह बात हजम कर पाना तो मुश्किल होगा। हजम कर पाने से याद आया, बात तो हजम तब भी नहीं हुई थी, जब BMC को पूरे मुंबई में केवल कंगना रनौत का दफ्तर ही अवैध दिखा था, और उसे तुड़वाया भी गया था, हकीकत में BMC को कंगना का दफ्तर केवल इसीलिए अवैध दिखा, क्योंकि कंगना ने उद्धव ठाकरे यानी कि शिव सेना की जमकर आलोचना की थी। अब अगर पावर का इस्तेमाल करना सीखना है तो कोई शिव सेना से सीखे, क्योंकि जब इसी सरकार के नेता 'संजय राउत' मीडिया के सामने इसी अभिनेत्री को खुलेआम गाली देते हैं, तो उनका कुछ नहीं होता, मगर जब कंगना रनौत ने बिना गाली दिए शिवसेना की थोड़ी आलोचना क्या कर दी, तो इनका दफ्तर BMC के द्वारा तोड़ दिया गया। कमाल की है यह सरकार अपना बदला छोड़ती नहीं है, तभी तो देखिए ना एक नेवी से रिटायर्ड बुजुर्ग व्यक्ति ने इनके किसी नेता को एक कार्टून क्या फॉरवर्ड कर दिया, उस बुजुर्ग को शिव सेना के कुछ कार्यकर्ताओं ने तो दौड़ा-दौड़ा कर मारा उसकी आंखें सुझा दी।

तो अब आप अंदाजा लगा ही चुके होंगे की जिसने भी इनके खिलाफ आवाज उठाई है, उनका क्या हश्र हुआ। बचे रह गए थे, तो सिर्फ 'अर्नब गोस्वामी' जिन्होंने उद्धव ठाकरे की और इनके पार्टी के अन्य नेताओं की भर भर के आलोचना की है। ऐसे में मुंबई पुलिस के द्वारा खेला गया TRP फर्जीवाड़ा का पत्ता, कहीं शिव सेना की 'बदले की आग तो नहीं' क्योंकि गली के गुंडे हो, या BMC के अधिकारी, या चाहे मुंबई पुलिस के कमिश्नर हो, सबका मालिक एक हैं, शिव 'भगवान' माफ करिएगा 'सेना'।
अंत में रही बात अर्णब गोस्वामी की तो यह किसी से छुपा नहीं है, कि उनकी पत्रकारिता मोदी सरकार के पक्ष में होती है। वह मुद्दों को उठाते हैं, मगर उद्देश्य उनका सच्चाई को सामने लाना कम जरूरी होता है, बल्कि उन मुद्दों से खुद को 'सनातनी' और 'राष्ट्रवादी' दिखाना ज्यादा जरूरी होता है। उनका 'सुशांत सिंह राजपूत' को इंसाफ दिलाने की मुहिम तो फेल हो गई, मगर एक बात कहूंगा, कि उनकी इस मुहिम ने गहरी नींद में सो रही मुंबई पुलिस के पैर के नीचे चल रही 'ड्रगवुड इंडस्ट्री' को उजागर जरूर कर दिया है।
मैं उम्मीद करता हूं, कि यह 'बदले की आग' नहीं होगी, मुंबई पुलिस सबूतों के साथ इस इल्जाम को कोर्ट में साबित जरूर करेंगी।

शुक्रिया, राहुल सिंह द्वारा

Thursday, 8 October 2020

सुशांत की गाड़ी, आत्महत्या से चली और आत्महत्या पर ही आ रुकी, नहीं मिली इंसाफ की मंजिल

 14 जून 2020 भारत में सनसनी की तरह एक खबर फैली, 'बॉलीवुड स्टार सुशांत सिंह राजपूत ने अपने घर में पंखे से लटक कर की आत्महत्या' बस इतनी सी थी यह खबर, उसके बाद अगले दो-तीन दिन तक मीडिया में यह खबर टॉप बैंड पर बनी रही और उसके बाद ये चैप्टर बंद हो गया।

मगर तारीख 25, जुलाई 2020 को ये चैप्टर फिर खुला जब सुशांत के पिता के.के सिंह ने पटना के राजीव नगर थाने में 'रिहा चक्रवर्ती' के खिलाफ FIR दर्ज कराई।
बस फिर तो मीडिया ने सर पे कफन बांधा और 'Justice for SSR' का नेमप्लेट लगाकर सुशांत नाम की गाड़ी चलाना शुरु कर दी और इंसाफ की मंजिल तक पहुंचने का तय कर लिया, चाहे फिर रास्ते में जो आए। आइए आपको बताते हैं यह सफर कैसा रहा-
रंग बिरंगे हेडलाइंस चले 'रिहा का काला जादू', 'दगाबाज रिहा', 'झूठी रिहा', 'नशेड़ी रिहा', 'ड्रगी रिहा और ना जाने क्या क्या। सबसे पहले रास्ते में चेकिंग लगी ED की, जहां सुशांत नामक गाड़ी की जांच हुई, थोड़ा बहुत मामला गड़बड़ निकला मगर गाड़ी को आगे जाने दिया, फिर CBI की चेकिंग लगी, लंबी जांच पड़ताल चलने लगी, रिहा के साथ-साथ बहुत से लोग जेल भी गए। 'कंगना राणावत' तो इस गाड़ी की बहुत पहले से 'को-कंडक्टर' बनी हुई थी, रास्तों में उन्होंने खूब सुर्खियां बटोरी, ईतनी सुर्खियां बटोरी कि अपना ऑफिस ही तुड़वा बेठी, कुछ दिनों के लिए नेमप्लेट बदला 'Justice for SSR' से नेमप्लेट Justice for kangna' हो गया। फिर गाड़ी की रफ्तार रास्ता भटकने के कारण धीमी पड़ने लगी, तो नेताओं ने कहा, 'इंसाफ की मंजिल मिले ना मिले गाड़ी को बिहार घुमा लो' अब ये तो आप सब को पता ही है, बिहार में क्या है इस वक्त। इसी दौरान बीच रास्ते में 'बेरोजगारी' आई मीडिया वालों ने सुशांत की गाड़ी से उसे कुचल दिया, 'भीषण आर्थिक मंदी' आई उसे भी कुचल दिया, 'कोरोना का बढ़ता दर' और 'लोगों की मौत' इसे भी कुचल दिया, 'युवाओं का रोजगार को लेकर तगड़ा विरोध प्रदर्शन' इसे भी कुचल दिया, कोई नहीं चला। अब अंत में भटकते-भटकते सुशांत की गाड़ी जा पहुंची 'ड्रगीवुड' जहां लगी थी NCB कि चेकिंग। इस चेकिंग में किन-किन के नाम सामने आए वह तो आप भली-भांति जानते ही होंगे, मगर अफसोस की बात यह रही कि आखिरकार मीडिया सुशांत की गाड़ी को इंसाफ की मंजिल तक नहीं ही पहुंचा पाई। खूब मेहनत की, खूब पसीना बहाया, खूब चिल्लाया, सब बर्बाद गया, मगर एक फायदा जरूर हुआ, झोली में TRP खूब भर-भर कर आई। ऐसे में एक कहावत याद आ रही हैं, -'अपना काम बनता भाड़ में जाए जनता'।
फिलहाल आज 6,अक्टूबर 2020 एक बार फिर यही खबर है 'बॉलीवुड स्टार सुशांत सिंह राजपूत ने अपने घर में पंखे से लटक कर की आत्महत्या' मगर पहली वाली खबर लोगों को हजम नहीं हो रही थी और चूंकि अब AIIMS ने अपनी रिपोर्ट में पुष्टि कर दीया है, की सुशांत सिंह राजपूत की मौत आत्महत्या ही है, तो अब धीरे-धीरे लोग मान रहे हैं। अंत में मुझे दुख है की, कई मीडिया चैनल्स की दो महीने तक चली 'सुशांत सिंह राजपूत को इंसाफ' दिलाने की मुहिम फेल हो गई, मेरी शुभकामनाएं उनके साथ हैं।

शुक्रिया, राहुल सिंह द्वारा

Wednesday, 7 October 2020

'कोमल पुष्प-अम' बिहार की एक नई उम्मीद

बिहार में एक वह दौर था जब, 1997 में पहली बार महिला मुख्यमंत्री 'राबड़ी देवी' बनी, यह तब हुआ जब उनके पति लालू यादव को 'चारा घोटाला' के आरोप में गिरफ्तारी वारंट जारी कर मुख्यमंत्री के पद से हटाया दीया गया। इससे आप अंदाजा लगा ही चुके होंगे हैं, कि उस दौर में जब 'मुख्यमंत्री' ही भ्रष्टाचारी थे, तो पूरी राज्य सरकार कैसी रही होगी।

खैर छोड़िए, आज देश बदल चुका है, मोदी जी के संदर्भ में कहूं तो 'भारत' अब 'नया भारत' बन चुका है। वह 1997 था जब उन्हें मजबूरी में बिहार की सत्ता को संभालना पड़ा और अब 2020 है और बिहार चुनाव में एक बार फिर महिला प्रत्याशी के रूप में बिहार के दरभंगा जिले की बेटी 'पुष्पम प्रिया चौधरी' मुख्यमंत्री पद के लिए अपनी दावेदारी 8, मार्च 2020 को घोषित कर चुकी है। एक मिनट अगर आप इसकी तुलना राबड़ी देवी से कर रहे हैं, तो यह बिल्कुल गलत होगा।
लंदन के इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेंट स्टडीज, यूनिवर्सिटी ऑफ ससेक्स, यूके और पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन के लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स एंड पॉलिटिकल साइंस से डेवलपमेंट स्टडीज में एमए के साथ सशस्त्र कर चुकी पुष्पम प्रिया चौधरी ने अपनी पार्टी 'प्लूरल्स' बनाकर बिहार चुनाव के रेस में अकेले दौड़ने वाली हैं। हालही में उन्होंने अपने 40 उम्मीदवारों की पहली सूची भी जारी कर दी है और आगे 32 अन्य उम्मीदवारों की लिस्ट जल्द ही जारी कर दी जाएगी। हालांकि वह खुद 2 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ेगी पहला मधुबनी जिले के 'बिस्फी' से और दूसरा 'मगध' क्षेत्र से। गौर करने वाली बात यह है की उम्मीदवारों के 'जाति' वाले 'सेक्शन' में 'प्लूरल्स पार्टी' ने उनके प्रोफेशन का जिक्र किया है। पार्टी के उम्मीदवारों में डॉक्टर, इंजीनियर, प्रोफेसर, टीचर, सोशल एक्टिविस्ट, वकील, बिजनेसमैन, किसान और गृहिणी शामिल है। ऐसे में अगर बिहार में 'प्लूरल्स पार्टी' की सरकार बनती है, तो यह 'जातिवाद' को कम करने और साक्षरता को बढ़ाने की एक अच्छी पहल साबित हो सकती है। क्योंकि बिहार में 'जातिवाद' चरम पर है, करीब 80% लोग बिहार में मतदान आज भी प्रत्याशी के 'जाति' के आधार पर ही करते हैं। पार्टी के कई तरह के दमदार 'टैगलाइन' है, जैसे कि "Love Bihar, Hate Politics" और “आप सीढ़ी पर चढ़ने पर ध्यान केंद्रित करें और हम सांपों से निपटते हैं”। इस तरह के हटके 'टैगलाइंस' को देखकर एक नई सोच और नई उम्मीद की किरण नजर आती है बिहार में।
फिलहाल इनके पिता की बात करें तो 'विनोद चौधरी' JDU के अतितकालीन MLC रह चुके हैं और दरभंगा के लेहरियासराय मैं दो दशकों से पत्रकार भी रह चुके हैं। बेटी के विधानसभा चुनाव लड़ने पर चौधरी जी का कहना है, कि वह वयस्क और शिक्षित हैं यह उनका फैसला है। मगर BJP-JDU, RJD-Cong, LJP-BJP जैसे महागठबंधन वाले कांटों में क्या अकेली 'प्लूरल्स पार्टी' की 'कोमल पुष्प-अम' खिल पाएंगी, यह तो परिणामों के घोषणा के बाद ही पता चल पाएगा। 
अंत में जाते-जाते आपको एक बात बताते जाते हैं, सुनने में आया है की अगर 'पुष्पम प्रिया चौधरी' जीतती है तो बिहार को 2030 तक यूरोप में तब्दील कर देंगी यह उनका वादा है। अब  आप इसे मजाक भी समझ सकते हैं और नहीं भी, तय आपको करना है।

नमस्कार, राहुल सिंह द्वारा

Tuesday, 6 October 2020

इस बार नहीं बरसेगा माता का आशीर्वाद 'आत्मनिर्भर भारत' पर

 सुंदर-सुंदर पंडाल, ऊंची-ऊंची दुर्गा माता की प्रतिमा, धूप-अगरबत्ती की चारों ओर फैली मनमोहक सुगंध, कान में बजते भजन, लोगों की भीड़, रंग-बिरंगी दुकाने और हर दो कदम पर ठेले वालों की गूंजती आवाज आइए 50 रुपए,..! आइए 100 रुपए,..! कोई गुब्बारे बेचता, तो कोई चूड़ियां बेचता, तो कोई खिलौने बेचता। ठीक ऐसा ही हर साल देखने को मिलता था दुर्गा पूजा के महापर्व पर।
मगर इस साल कोरोना वायरस के समय में यह सब कल्पना बनकर रह जाएंगे। क्योंकि हालही में भोजपुर जिला के SDM ने ये ऐलान किया हैं, की भारत सरकार द्वारा कोविड-19 के सुरक्षात्मक उपाय आदर्श आचार संहिता के अनुसार ही कोई भी पर्व मनाया जाएगा, उन्होंने कहा गणेश चतुर्थी, मुहर्रम, रामनवमी इत्यादि को संयमित तरीके से मनाया गया है, तो अब दुर्गा पूजा को भी संयम के साथ मनाना है। महामारी को देखते हुए पंडाल लगाकर मूर्तियां बैठाने की अनुमति नहीं होगी जिन्हें मूर्तियां स्थापित करनी है, वह अपने घरों में इसका आयोजन कर सकते हैं। इसके अलावा 'चेहल्लुम' जो कि एक मुसलमानों का त्यौहार है इस पर भी किसी प्रकार का जुलूस नहीं निकाले जाएंगे।
लीजिए एक तरफ जहां मोदी जी आत्मनिर्भर भारत के तहत MSME का कल्याण करना चाहते हैं, तो वही कोरोना वायरस हर बार बीच में टांग अड़ा ही देता है।
आइए जानते हैं किस-किस के पेट पर लात पड़ेगी दुर्गा पूजा के आयोजन ना होने से,
जैसा कि मैंने शुरूआती में जिक्र किया 'सुंदर-सुंदर पंडाल' ये लगाने वाले उन सभी ठेकेदारो की आमदनी इस बार नहीं होगी। ऊंची-ऊंची दुर्गा माता की प्रतिमा बनाने वाले उन सभी मूर्तिकारो की पेट इस बार कटने वाली हैं। जब मूर्तियां नहीं होगी तो पूजा भी नहीं होगी और पूजा नहीं होगी तो धूप, अगरबत्ती की खरीदी में गिरावट आएगी परिणाम स्वरूप कुटीर उद्योग कंपनियों को बड़ा घाटा सहना पड़ सकता है। माता की मूर्ति के सजावट में तमाम तरह की चीजों का उपयोग होता है जैसे की चुनरी, कपड़े, माला, कागज, रंग बिरंगी लाइट आदि इन सब का उत्पादन कुटीर उद्योगों द्वारा पूजा के दो-तीन महीने पहले से ही शुरू हो जाता है, मगर इस बार यह उम्मीद कम नजर आ रही है।
और सबसे बड़ी मार उन लघु उद्योगपतियों को झेलनी पड़ेगी जो छोटे-छोटे खिलौने, चूड़ियां, माला, झूमके, मूर्तिया आदि वस्तुएं ठेलो पर सजा कर बेचा करते थे।
हर किसी को त्योहार, पर्व का इंतजार रहता है, क्योंकि ऐसे बड़े पर्व, छोटे बड़े व्यापारियों के लिए एक अच्छा कमाई का साधन प्रतीत होते हैं, मगर अफसोस इस बार यह सब कुछ संभव हो पाना मुश्किल है।
मगर वहीं दूसरी ओर हम इसके अच्छे परिणामों की बात करें, तो यह कहना गलत नहीं होगा कि जिस समय भारत कोरोना वायरस से अपने एक लाख से भी अधिक लोगों की जान गंवा चुका है, और 66 लाख से अधिक लोग इससे संक्रमित हैं, तो ऐसे में यह कदम सराहनीय साबित होगा, क्योंकि जब तक वैक्सीन नहीं निकलती तब तक हमें इस तरह चेतावनी के साथ काम करना पड़ेगा, और यह पहली बार नहीं है, इससे पहले भी कई विशाल पर्व संयम के साथ मनाए जा चुके हैं। अंत में मैं बस यही कहना चाहूंगा की जरूरत है, हमें इस वायरस को फैलने से रोकने की और लोगों की जान बचाने की, क्योंकि जब जान होगा तो यह जहांन होगा इसीलिए 'जब तक कोरोना है, घरों में रहना है'।

नमस्कार, राहुल सिंह द्वारा

Wednesday, 22 July 2020

मेरे मन कि आवाज

इसे आप लोग पूरा पढ़ेंगे या नहीं उससे मुझे कोई मतलब नहीं, मगर मैं जो लिखने जा रहा हूं वह मेरी अंतरात्मा की आवाज है।
पता है, सबसे ज्यादा अफसोस कब होता है जब आप किसी से उम्मीद लगाते हैं पर वह आपकी उम्मीदों को नजरअंदाज कर दे, आपकी उम्मीद पर खरा ना उत्तरे, तब होता है सबसे ज्यादा अफसोस। जब आपके परिवार के साथ या आपके साथ कुछ गलत होता है तब सबसे ज्यादा आपकी उम्मीदें किस से होती है पुलिस प्रशासन से। मगर जरा सोचिए एक आम इंसान भला क्या कर लेगा अगर येही आपकी मदद ना करें तो, कुछ कर लेंगे क्या।
पता है दिक्कत क्या है। इस कलयुग में किसी भी लड़की को छेड़ना, उसे गाली देना या अभद्र भाषा का प्रयोग करना यह सब एक आम बाते हो चुकी है, यह सब चलता है, पुलिस को भी यही लगता हैं तभी पुलिस इनके खिलाफ कोई कारवाई नहीं करती और होता क्या है, वह सभी मनचले लड़के जो यह करते हैं उनको बढ़ावा मिलता है और परिणाम में वह कल को निर्भया, कठुआ, प्रियंका रेड्डी जैसे कांड करते हैं। अगर आप भी 'लड़की छेड़ना' और 'लड़की का रेप होने' में फर्क ढूंढते हैं तो कसम से आप भारत में रेप को कभी रोक नहीं पाएंगे। मगर चुक कहां हो जाती है, वही हो जाती है जहां पुलिस फर्क ढूंढने लग जाती है 'लड़कियों को छेड़ने' जैसी बात को एक छोटा अपराध समझ बैठती हैं, और 'रेप' को एक बड़ा अपराध।
एक साल पहले की बात है, उत्तर प्रदेश के 'गाजियाबाद' में एक पत्रकार जिसका नाम 'विक्रम जोशी' था, उसकी बेटियों को कुछ आवारा मनचलों ने छेड़ा, विक्रम ने थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई और उम्मीद लगा कर बैठे की पुलिस प्रशासन कुछ ना कुछ तो करेगी, मगर उसे यह नहीं पता था की पुलिस के लिए यह एक आम बात है। एक साल बीत गया मनचलों की हिम्मत बढ़ी और उन्होंने विक्रम की बेटियों को फिर छेड़ा घर के पास गाली गलौज की। एक बार फिर विक्रम ने पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई, मगर फिर पुलिस चुप रही। विक्रम उम्मीद लगाकर बैठे रहे। मगर मनचलों की हिम्मत इस बार कुछ इस प्रकार बढ़ी कि उनके इरादे कुछ ऐसे थे।
"हम तुम्हारी बहन, बेटियों को छेड़ेंगे, उन्हें गालियां देंगे, गंदी गंदी बातें कहेंगे मगर तुम विरोध मत करना यह सब हम तुम्हारे सामने करेंगे, तुम्हारे घर में घुसकर करेंगे मगर तुम विरोध मत करना अगर करोगे तो" !!
दिनांक 20 जुलाई रात के करीब 10 बजकर 30 मिनट के पास 'विक्रम जोशी' को उन्हीं मनचलों ने उसही के घर के पास सड़क पर उसकी मोटरसाइकिल रोककर उसही की बेटियों के सामने उसे पीटा और सर में गोली मार दी।
अफसोस सिर्फ इस बात का है, की जितनी हिम्मत यह मामूली गुंडे दिखाते हैं ना, उतनी ही हिम्मत पुलिस दिखाने लग जाए तो, आज दुनिया के कई बड़े बड़े अपराध होने से बच जाए। यह बहुत बड़ी बात कह दी मैंने, जबकि हकीकत इससे बहुत परे है। हकीकत में पुलिस इंतजार करती है, खून बहने का, आंसू बहने के और फिर गिरफ्तार करती है। अंत में गया किसका, पुलिस का,,?? 'कुछ नहीं',, आपका गया सब, अब थोड़ा आसु बहाईए, एक मिनट कहीं आपको "System" पर गुस्सा तो नहीं आ रहा, अच्छा ये लीजिए 'दस लाख' रखिए जेब में, और खुश रहिए। और हां,, खबरदार जो "System" बदलने की कोशिश की तो, वो तुम्हारे औकात के परे है।

नमस्कार, राहुल सिंह द्वारा

Tuesday, 7 July 2020

CASE STUDY ON CORONA VICTIMS

Brief And Origin of 'n-COVID -19'
साल 2002 में 'बिल्ली'(Cat) से इंसानी शरीर मैं एक वायरस आया, जिसे 'SAARS' नाम से जाना गया, फिर इसी के जैसा 'MERS' वायरस आया जो इंसानी शरीर में 'ऊंट'(Camel) के जरिए आया।
दिसंबर 2019 चीन के वुहान जिले में अचानक से 'निमोनिया' के मरीज बढ़ने लगे, जब उन मरीजों पे किसी भी दवाई का असर नहीं हुआ, तब चीनी वैज्ञानिकों ने खोज करना शुरू किया, जिसमें चाइना के 'सीफूड सिटी''Quanan Seafood Holesale Market' का नाम सामने आया, जहां सांप, केकड़ा, मछली, चमगादड़ व अन्य जीव खाए जाते हैं। इसके बाद जब सभी मरीजों का जांच(Test) किया गया, तब एक नए प्रकार का वायरस सामने निकल कर आया जो लगभग 'SAARS' वायरस के जैसा ही था, जिसे "नोवल कोरोना वायरस" या n- COVID -19 के नाम से जाना गया।
बात करें कोरोना वायरस के मृत्यु दर की तो यह मात्र 3% है। कोरोना वायरस से उस ही व्यक्ति की मौत होती है, जिसका 'इम्यून सिस्टम' कमजोर होता हैं, जैसे बुजुर्ग और बच्चे। अधिकतर मौतों की वजह या तो बेहद खतरनाक निमोनिया हो जाना या फिर इसके कारण आपकी किडनी का फेल हो जाना है। कोरोना वायरस अधिकतर हवा में बूंदों के कारण फैलता है, यानी कि जब कोरोना ग्रसित कोई छीकता या खास्ता है, तो मुंह से निकली बूंदे सामने वाले को कोरोना संक्रमित कर सकती है। माना जाता है की कोरोना वायरस अपने लक्षण 2 से 14 दिनों में दिखाता है। मगर कई बार जांच के बाद भी इसके लक्षण को पकड़ पाना मुश्किल होता है। कुछ ऐसा ही दिल्ली में एक मरीज के साथ हुआ

Patient name : Jit Singh (ASI in Delhi Police, 'Haujkhash')
Age: '57' year'

Place where he infected And Initial Symptoms
दिनांक: 30-मार्च को 'जीत सिंह' की ड्यूटी दिल्ली के 'युसूफ सराय' इलाके में थी। ड्यूटी से वापस घर लौटने के दौरान जीत सिंह के शरीर में दर्द शुरू हो गया, वह बताते हैं रात तक दर्द इतना बढ़ गया कि उन्हें दर्द की दवाई खानी पड़ी, रात भर के लिए तो उन्हें उस दर्द से आराम मिल गया, मगर अगले दिन 31-मार्च को वह दोबारा ड्यूटी पर गए और फिर से उनके शरीर में तेज दर्द होने लगा, उन्होंने अपने TI अफसर को बताया, कि मेरी तबीयत बहुत ज्यादा खराब होते जा रही है। अफसर ने उन्हें अस्पताल जाने की सलाह दी। दिनांक 1-अप्रैल को वह 'ऐम्स अस्पताल' गए, जहां डॉक्टरों ने मेंरा बीपी और तापमान चेक किया, उसके बाद उन्होंने मेरा कोरोना का भी जांच किया और कहा आप में कोरोना के कोई लक्षण नहीं है, आप 14 दिन के लिए 'Home quarantine' रहिये।

HOME QUARANTINE (Phase-1)
दिनांक 1-अप्रैल को अस्पताल से घर आने के बाद जीत सिंह अपने आप को सबसे अलग करके 14 दिन के लिए 'Home quarantine' किया। जीत बताते हैं, क्वारंटाइन होने के बाद भी मेरा तापमान और बुखार वैसा का वैसा ही रहा, हर बार 103-104 बुखार रहता था। उनके परिवार वालों ने 'Home Quarantine' के दोरान उनकी अच्छे से खातेदारी की, उनको हर वक्त पपीता और अन्य फल खिलाया। परिवार को हमेशा से डर बना रहता था, कि कहीं जीत को कोरोना वायरस ना हो जाए।

After Home Quarantine
'होम क्वॉरेंटाइन' से कोई आराम ना मिलने के बाद, जित उसके बाद 'बंसल' अस्पताल मे गए। उसमें उन्होंने अपना TFT, PFT, मलेरिया, टाइफाइड आदि, सब चेक करवाया। उसके बाद उन्हें एक डॉक्टर ने सलाह दी 'कि आप अपना कोरोना टेस्ट भी करा लीजिए' जीत ने कोरोना का जांच फिर से करवाया, मगर वह भी फिर नेगेटिव आई। इसके बाद वह इतना परेशान हो गए की वह ड्यूटी पर भी नहीं जाते थे, और घर पर आराम करते थे मगर दिनांक 21-अप्रैल को जीत ने एक बार फिर हिम्मत की और अपने क्षेत्र में गए, वहां उन्होंने अपने सीनियर अफसरों को एक बार फिर बताया कि मेरी तबीयत ज्यादा खराब हो रही है, सांस लेने में समस्या होने लगी है और बुखार पिछले एक हफ्ते से 103-104 बना रह रहा है। उसके बाद जीत के अफसर उसे सफदरगंज ले गए फिर 'एम्स' ले गए वहां उन्होंने अपना कोरोना का तीसरी बार चेकअप कराया। दिनांक 22-अप्रैल हौज खास के 'डैग लैब' से ठीक शाम के 6:30 मिनट पर मेरी रिपोर्ट आ गई जिसमें मेरा 'n- COVID-19' पॉजिटिव आया। जीत का कुल तीन बार कोरोना का जांच हुआ जिस में से वह तीसरी बार में पाजिटिव पाए गए।

His Reaction After 'COVID-19' Positive
जीत बताते हैं जब उन्हें मालूम चला कि वह 'कोविड-19' पॉजिटिव हैं तब उन्हें यकीन नहीं हुआ। उन्हें सबसे ज्यादा परेशानी अपने अंदर कोरोना वायरस के लक्ष्ण को पहचानने में आई दिक्कतों के कारण हुई, क्योंकि पिछली दो बार जब उन्होंने अपना कोरोना वायरस का जांच करवाया था, तो वह दोनों बार नेगेटिव पाए गए थे, मगर तीसरी बार पॉजिटिव हो गए। उसके बाद धैर्य से काम लेते हुए वह अपने घर गए और अपने बच्चों से कहा तुम लोग यहीं रहो, मैं कुछ दिनों के लिए अस्पताल जा रहा हूं, वह अपने बड़े बेटे को लेकर अस्पताल गए, और वहां उन्हें अपने सीनियर अफसर मिले। अस्पताल के स्टाफ मौके पर सारे वही मिले, जिन्होंने मुझे भर्ती कराया अस्पताल में। जीत बताते हैं, कि जब उन्हें भर्ती किया गया तो वह खुश हुए क्योंकि उन्हें मालूम था, कि अब मैं ठीक हो जाऊंगा।

HOSPITAL QUARANTINE (Phase -2)
सफदरगंज हॉस्पिटल मैं उन्हें दिनांक 22-अप्रैल, श्याम 8:00 बजे क्वारंटाइन कर दिया गया। उन्हें शुरुआती में अलग से कपड़े दिए गए, मुंह पर लगाने के लिए मास्क दिया गया और हाथों को हमेशा साफ रखने के लिए 'सैनिटाइजर' भी दिया गया। इसके बाद उनका रोज इलाज चला जिसमें ऐसी कोई डरने वाली बात नहीं थी, उन्हें इलाज के दौरान कोई दर्द महसूस भी नहीं हुआ। हालांकि बीच-बीच मेंं उन्हें सांस लेने में तकलीफ हुई, तब उन्हें ऑक्सीजन दिया गया, AC या पंखा चलाना सख्त मना था, जिसके कारण जीत सिंह बताते हैं उनकी 'टी-शर्ट' रात में पसीने से पूरी भीग जाती थी। हॉस्पिटल के कर्मचारी हर 10 मिनट बाद मरीजों के पास उनका हालचाल जानने के लिए आते थे, और खाना हर रोज तीन वक़्त का मिलता था। जिस कमरे में जीत भर्ती थे उसी कमरे में कोविड-19 का ही एक और मरीज भी भर्ती था, मगर दोनों की दूरी को बनाकर रखा गया था। वह दोनों सुबह और शाम 'प्राणायाम' भी किया करते थे, जिससे उन्हें काफी आराम महसूस होता था। जीत बताते हैं हॉस्पिटल में साफ सफाई को लेकर खास ध्यान रखा जाता था, हॉस्पिटल का हर एक कर्मचारी अपने आप को 'PPE' किट से ढक कर रखता था। हॉस्पिटल के सभी डॉक्टरों ने भी मुझे सलाह दी की 'घबराने की कोई बात नहीं है, आप एक सामान्य मरीज की तरह रहो, आप बहुत जल्द ठीक हो जाओगे'।

Expectations VS Reality
जीत बताते हैं, कि उनके दिमाग में कभी भी यह फील नहीं हुआ, कि मुझे कोरोना वायरस हो सकता है, उनके दिमाग में था कि वह एक सामान्य बीमारी से ग्रसित हुए हैं, जो कुछ दिनों में ठीक हो जाएगी, उनके दिमाग में यह कभी भी रहा ही नहीं, कि उन्हें कोरोना जैसी खतरनाक बीमारी कभी हो जाएगी। उन्हें लगा की मुझे कुछ दिन इलाज मिलेगा और मैं बिल्कुल ठीक हो जाऊंगा। उन्हें शुरुआती में लगा था, कि कोरोना वायरस के इलाज में शायद दर्द की मात्रा अधिक होगी, मगर हकीकत इसके कुल विप विपरीतरीत थी। वह जब बीमार थे, तो उन्हें लगता था कि उनके अफसर और दूसरे पुलिस वाले उनसे दूर भागेंगे मगर हकीकत में कुछ को छोड़कर उनके अफसरों ने जीत की बहुत मदद की। वह बताते हैं जांच में दो बार 'नेगेटिव' आने पर उन्हें पूरा यकीन हो गया था, कि मुझे 'कोविड-19' नहीं है, मगर जब तीसरी बार जांच कराया तो परिणाम हैरान कर देने वाला था

Message from 'Jit Singh' to other Corona Victims
जीत सिंह कुल 11 दिनों के अंदर यानी कि 3-मई को कोविड-19 को मात देकर अपने घर वापस लौटे। जहां उनका उनके परिवार वालों ने स्वागत किया। और दिनांक 6 मई से जीत सिंह दोबारा अपनी ड्यूटी पर गए। जीत सिंह कहते हैं, कोरोना वायरस से लड़ना है तो सबसे ज्यादा 'धैर्य' और 'संयम' बना कर रखना जरूरी है। इसके अलावा इसे दिमाग पर ना ले कि मुझे कोरोना, कोरोना है, हमें हो जाएगा,। डॉक्टर और प्रशासन द्वारा बताए गए सभी नियमों का पालन करें खुद से कोई भी काम ना करें, अपने परिवार से तभी मिले जब आप पूरी तरह से स्वस्थ हो जाए और जिस तरीके से मैं 4 से 5 दिन में रिकवर हुआ वैसे ही आप भी 4 से 5 दिनों में ही ठीक हो जाएंगे, बशर्ते घबराएं ना और संयम बना के रखें।

धन्यवाद, राहुल सिंह द्वारा

Sunday, 5 July 2020

अब डिजिटल वार भी

भारतीय सरकार ने चाइना के कुल 59 एप्स पर बैन लगा कर डिजिटल वार की शुरुआत कर दी है, मगर क्या ये बैन हमेशा के लिए रहने वाला है या फिर जब तक भारत और चीन का सीमा विवाद चलेगा तब तक, कहीं यह बैन भारतीय लोगों के चीन के प्रति विरोध प्रदर्शन को देखते हुए मजबूरी में तो नहीं किया गया। यह सब मैं आपको आगे बताऊंगा। मगर आइए पहले जरा मामले को समझते हैं।

-Negative impacts (Demerits of ban Chinese apps)
जरा गहराई से सोचिए क्या कोई केवल 15 सेकंड की वीडियो मैं अपना हुनर दिखा सकता है, क्या कोई 15 सेकंड की रोज वीडियो बनाकर प्रसिद्धि पा सकता है, जी हां, यह सब संभव हुआ केवल टिक-टॉक जैसे ऐप के वजह से। मगर टिक टॉक, यूसी ब्राउजर, यूसी न्यूज़ और शेयर इट जैसे बड़ी कंपनियों पर बैन लगने से ना सिर्फ कई लोगों के लिए हुनर का प्लेटफार्म छीना बल्कि इन कंपनियों को भारत में चलाने वाले कई लोग और पत्रकार जो यूसी न्यूज़ में अपना आर्टिकल देते थे उनके हाथों से रोजगार भी छीना, वह सब अब बेरोजगार हो गाए। कहीं ऐसा तो नहीं चीन के साथ सीमा विवाद के बदले की भावना में भारत खुद के पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहा है, क्योंकि भारत में लोकडाउन के बाद वैसे भी बेरोजगारी दर दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है, ऐसे में सरकार ने इन चाइनीस ऐप्स को बैन करके बेरोजगारी की दर को दुगना करने का काम किया हैं।
बात करें आंकड़ों की तो भारत में टिक-टॉक का हेड क्वार्टर 'मुंबई' में हैं, जहां लगभग दो हजार लोग इसमें काम करते थे। टिक-टॉक सबसे ज्यादा भारत में उपयोग किया जाता है, लगभग 30% यानी कि 12 करोड़ एक्टिव यूजर्स भारत में है, यूसी ब्राउजर के भी 12 करोड़ यूजर हैं, शेयर इट के 20 करोड़, क्लब फैक्ट्री और कैमस्कैनर के 10 करोड़ यूजर्स हैं। अब कई लोगों का कहना है, केवल चाइनीस एप्स को ही क्यों बैन किया गया और इससे क्या होगा। आइए बात करते हैं।

-Why only Chinese apps and its consequences
बात करें चाइनीस एप्स के केवल बैन होने की तो आपको बता दे, 'टिक-टॉक' US और ऑस्ट्रेलिया मिलिट्री में भी बैन है, इसकी बड़ी वजह ये है, की टिक-टॉक डेटा चोरी करके कहीं दूसरे सर्वर पर भेजता है जिसकी खोज 'European data protection authority' और USA भी करने में लगा हुआ है। टिक-टॉक अपनी 'Privacy policy' में खुद कहता है- 'we collect information about your location, including location information based on your SIM Card and IP address' लीजिए आपको बता दें 'गूगल मैप' और 'आरोग्य सेतु' जैसे जरूरी एप्स भी आपका लोकेशन और डाटा नहीं ले सकते बिना आपके इजाजत के। इसके अलावा दूसरा कारण 'Club factory' ऐप का है जो कि एक 'E-Commerce' कंपनी है, ये बिना 'कस्टम ड्यूटी' यानी कि 'टैक्स' दिए बिना अपने ऑर्डर की डिलीवरी उपभोक्ताओं तक करती है, इसको लेकर लोगों ने भी बहुत सवाल उठाए।
अब बात करें परिणाम की तो यह पहली बार नहीं है जब टिक-टॉक को भारत ने बैन किया, इससे पहले साल 2018 मैं भी टिक-टॉक को बैन किया गया, यह कहकर की 'टिक-टॉक "चाइल्ड पोर्नोग्राफी" जैसे कंटेंट दिखाता है' और तब "बाइटडांस" को रोज 500 लाख US डॉलर का घाटा सहना पड़ा था। अब आज भारत में टिक टॉक के फिर बैन होने से चीन को 10% का घाटा सहना पड रहा है 'uninstalling' की वजह से। परिणाम में चीन ने भी भारत के 'न्यूज वेबसाइट्स' और 'ई-अखबार' बैन कर दिए हैं, चीनी दूतावास ने यहां तक विरोध किया और नाराजगी भी जताई। इसके अलावा मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक चीनी कंपनी 'ByteDanceltd' के टिक-टॉक समेत तीन एप्स पर बैन लगने से कंपनी को 6 बिलियन डॉलर का आर्थिक नुकसान होने का अनुमान भी है।

-Tik-Tok update statement VS Facts check
भारत में 'टिक-टॉक' के प्रमुख 'निखिल गांधी' ने टिक-टॉक बंद होने के बाद एक 'अपडेट' जारी किया जिसमें ये कहा गया:- 'हम भारत सरकार के अंतिम आदेश को मानने की प्रक्रिया को शुरू कर रहे हैं, टिक टॉक डेटा की निजता और भारतीय क़ानून के हिसाब से सुरक्षा ज़रूरतों का पालन करता है। हम भारतीयों का डेटा किसी भी विदेशी सरकार के साथ, यहां तक चीनी सरकार के साथ भी साझा नहीं करते। हम उच्च श्रेणी का दर्जा देते हैं, अपने उपभोक्ताओं को 'गोपनीयता' और 'अखंडता' के प्रति।
टिक-टॉक ने 'इंटरनेट का 'लोकतांत्रिक करण' किया है, यह सौ-करोड़ उपभोक्ताओं के साथ, 14 भारतीय भाषाओं में उपलब्ध है। जिसमें कलाकार, कहानी वाचक, शिक्षा और प्रस्तुतकर्ता, आधारित हैं अपना घर-बार चलाने के लिए।

-Facts check
'सलोनी गौर नजमा' जो टिक-टॉक पर कॉमेडी-वीडियो बनाया करती थी, जिसमें वो चाइनीस सरकार की आलोचना करती थी, मगर उसकी वीडियो हर बार हटा दी गई, क्या यह लोकतांत्रिक है ?, बिना पूछे आपका डेटा और लोकेशन की जानकारी लेना, क्या ये लोकतांत्रिक है ?
टिक-टॉक कहता है, हम अपना डेटा चीनी सरकार के साथ साझा नहीं करते। मगर साल 2017 में चाइना ने एक "Special Intelligence law" बनाया जिसमें यह कहा गया कि अगर साम्यवादी चाईना सरकार को किसी 'सुरक्षा कारणों' के लिए अगर किसी चीनी कंपनी से डेटा चाहिए तो वह कंपनी यह नहीं कह सकती कि ये 'प्राइवेट डेटा' हैं, उन्हें वो डेटा देना पड़ेगा।

-Some other laws of Communist Party of China
चाइना 'टेक्नोलॉजी' के मामले में आज तक एक तरफा व्यापार करते आया है। जिन 59 चाइनिस एप्स को भारत ने बैन किया वह पूरी दुनिया में फैले हुए हैं "Made in China" के नाम से। मगर चाइना में आप देखें तो यहां Google, Facebook, YouTube और Amazon जैसी बड़ी कंपनियों को घुसने तक नहीं दिया गया, बल्कि इनके टेक्नोलॉजी को चोरी किया गया और इनकी ही तरह बहरूपिये बनाएं। चाइना का YouTube हैं Youku, Google हैं baidu, Facebook हैं vaibo और Amazon हैं 'अलीबाबा'।
चाइनीस पॉलिसी कहती है, 'अगर किसी विदेशी कंपनी को चाइना में व्यापार करना है, तो उसे अपना IP (Intellectual Property) देना पड़ेगा और अगर कोई विदेशी कंपनी चाइना में अपनी टेक्नोलॉजी निर्यात करके संचालित करना चाहता है, तो उसे चाइनीस कंपनी के साथ "Joint Venture" बनाना पड़ेगा।

-At Last my opinion
अपनी राय देने से पहले मैं आपको लोकप्रिय गेम 'पब्जी मोबाइल' के बारे में बताना चाहूंगा। 'पब्जी मोबाइल' एक 'साउथ कोरियन' कंपनी "Blue Hole" की है, जिसे पूरी दुनिया में युवाओं ने खूब पसंद किया, मगर केवल चाइना में इस गेम को संचालित करने के लिए, जैसा कि मैंने आपको पहले बताया साउथ कोरियन कंपनी "Blue Hole" को चाइनीस 'Tech Company "Tencent" के साथ 'Joint venture' बनाना पड़ा तब जाकर चाइना में पब्जी मोबाइल को संचालित किया गया।
मेरी राय में हु-बहू केवल भारत को ही नहीं बल्कि सभी देशों को ऐसा ही करना चाहिए, चाइना अगर किसी भी देश में व्यापार करना चाहता है तो उसे उस देश के 'प्रिंसिपल' को फॉलो करना होगा। और अगर चीन किसी देश मैं अपनी टेक्नोलॉजी को संचालित करना चाहता है तो उसे उस देश के किसी 'Major tech Company' के साथ 'Joint Venture' बनाना होगा, अपनी निष्ठा अपने उपभोक्ताओं के प्रति साबित करनी होगी ना कि चीनी साम्यवाद पार्टी के प्रति। और भारत को डेटा की सुरक्षा को लेकर थोड़ा सोचना चाहिए या कोई नियम बनाना चाहिए। अब रही बात चीनी एप्स के हमेशा के लिए बैन रहने या ना रहने की तो, हम इसके बारे मैं ना ही सोचे तो बेहतर है, हमें इसके विकल्पों के बारे में सोचना चाहिए अन्यथा 'विकल्पों' को 'Make in India' बनाना चाहिए।

धन्यवाद, राहुल सिंह द्वारा

कहानी खूनी वार से आर्थिक वार तक

गलती तो चीन ने तब ही कर दी थी, जब उसने LAC के इस पार कदम रखा था, मगर हद पार तब कर दी जब 15-जून को चीनी सैनिकों ने भारतीय सैनिकों के साथ झड़प कर दी। जिसमें भारत के 20 जवान शहीद हो गए और चाइना के 53 सैनिक भी मारे गए। हालांकि सरकार ने चीन को लेकर सामने से कोई बड़ा बयान जारी नहीं किया, मगर आर्थिक मोर्चे की लड़ाई में सरकार ने कड़े संकेत दिए हैं, आइए बात करते हैं।

-Government Decision Against China
सबसे पहले सरकार ने स्टील आयात पर चीन सहित अन्य दो देशों पर भी 'Anti dumping duty' लगा दी, जिससे चीन द्वारा स्टील की बड़ी तादाद में डंपिंग पर टैरिफ लगेगा और आयात कम होगा। उसके बाद भारत में 80% से 90% सोलर उपकरणों का इस्तेमाल हम चाइना से किया करते हैं, मगर अब आयात को कम किया जा सके, इसके लिए भारत सरकार सोलर इनवर्टर, सोलर माड्यूल्स इन सबके आयात में 20% Basic custom duty (BCD) लगाएगी जो कि पहले 15% था। इसके बाद 22 जून से चीन से आ रहे सभी सामानों को बंदरगाहों पर रोक दिया गया, AIMED ( Association of Indian Medical device industry) ने अपनी रिपोर्ट मे बताया चीन से आने वाले माल की बंदरगाहों पर ही 100% जांच-पड़ताल की जा रही है, जिसके बाद उन सामानों को आगे बढ़ाया जाएगा। टेलीकॉम मंत्रालय ने BSNL को निर्देश दिए हैं, कि वह अपने काम में चीनी उपकरणों का इस्तेमाल कम कर दे, जैसे कि 4G सुविधा के उन्नयन में किसी भी चीनी उपकरणों का इस्तेमाल ना किया जाए, पूरे टेंडर्स को नए सिरे से जारी किया जाए और सभी प्राइवेट सर्विस ऑपरेटर को निर्देश दिया गया, की चाइनीस उपकरणों पर अपनी निर्भरता कम से कम करदे।इसके बाद भारतीय रेलवे ने भी चीन के साथ किए हुए करार खतम कर दिये, साल 2016 में 471 करोड़ का करार, जिसमें कानपुर और दीन दयाल उपाध्याय सेक्सन के बीच 417 km के रूट पर Signaling and Telecommunications का काम होना था, जिसका ठेका चीनी कंपनी को दिया गया था, जो आज के माहौल में खतम कर दिया गया, हालांकि रेलवे ने सफाई यह दि, कि चीनी कंपनियों के खराब प्रदर्शन के कारण हमें यह ठेका खत्म करना पड़ा। हरियाणा सरकार ने भी चीनियों के साथ हुए बड़े करार खतम कर दिये, 'हिसार' और 'यमुना' नदी के पास थर्मल पावर प्लांट से जुड़े 842 करोड़ के टेंडर थे, जो की आज खतम कर दिए गए। इसके अलावा आपको बता दें केंद्रीय ऊर्जा मंत्री 'आर.के सिंह' ने चीन को बड़ा झटका दिया है, बिना पूर्व अनुमति के अब चीन और पाकिस्तान से कोई भी बिजली उपकरण का सामान आयात नहीं किया जाएगा। सड़क परिवहन मंत्री 'नितिन गडकरी' ने भी कहा सड़क और फ्लाई ओवर के कामों में अब कोई भी ठेका चीनी कंपनियों को नहीं दिया जाएगा।

-Good and Bad Consequences along with my Opinion
अब आर्थिक मोर्चे की लड़ाई तो छिड़ चुकी है,मगर आइए जानते हैं इसके अच्छे और बुरे प्रभावों के बारे में।
मेरी राय में सरकार द्वारा स्टील के आयात पर 'Anti dumping duty' लगाकर और सोलर उपकरणों में 20% BCD लगाकर एक सराहनीय कदम उठाया है, क्योंकि इससे भारत के छोटे-बड़े उद्योगों को एक सुनहरा अवसर मिलेगा और विदेशी कंपनियों के साथ घरेलू बाजार में अनुचित प्रतियोगिता पर रोक लगेगी, भारत में कई लोगों को रोजगार की प्राप्ति भी होगी और इसी के कारण 'Make in India' को प्रोत्साहन भी मिलेगा। अगर इसके बुरे प्रभाव की बात करें तो स्टील और सोलर भारत में सस्ते दामों पर आयात किए जाते थे, क्योंकि उन देशों में यह सस्ते हैं। मगर अब भारत में यह महंगे बिकेंगे और साथ में विकल्पों की भी कमी होगी। बंदरगाहों पर चीन द्वारा आयात सामानों की जांच पड़ताल, बेहद जरूरी हैं क्योंकि ऐसे हालात में चीन पर भरोसा करना मुश्किल है। भारतीय रेल द्वारा कानपुर और दीनदयाल उपाध्याय सेक्शन के बीच Signaling and Telecommunications के करार को चीन से खत्म करना, मेरी राय में सही विचार है, क्योंकि इससे स्वदेशी Signaling and Telecommunications companies जैसे Gocl corporation limited, TVM Signalling, balaji Railroad systems limited, ANI अन्य कंपनियों को काम मिलेगा। मगर इसके बुरे प्रभाव की बात करे तो चीनी कंपनियों के मुताबिक, स्वदेशी कंपनियां यह काम अधिक पैसों में करेगी क्योंकि चीन में 'Signaling and Telecommunications' का काम सस्ते में होता है। हरियाणा सरकार ने भी चीन के साथ थर्मल पावर प्लांट के करार को खत्म करके स्वदेशी कंपनियों के लिए एक सुनहरा मौका दिया है। ऊर्जा मंत्री आरके सिंह के इस कदम से भारत को मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है क्योंकि बिजली उपकरणों का सामान चीन से लगभग 60% से 70% हम आयात किया करते थे, क्योंकि चीन बिजली के उपकरणों का  उत्पादन करने के लिए सबसे अच्छा देश माना जाता है, और अब आयात पर प्रतिबंध लगाकर हमें विकल्पों की कमी का भी सामना  करना पड़ेगा। अब देखना यह है, कि चीन के साथ हमारे संबंध आगे बेहतर होंगे या चीन को भारत के साथ आर्थिक मोर्चे की लड़ाई में मुंह की खानी पड़ेगी।

राहुल सिंह द्वारा

Wednesday, 27 May 2020

"हमने मजदूरी की है, प्रवास नहीं"

"कुछ महीने पहले"...........!!
उसने 'कमीज' के अपने ऊपर के दो बटन खोलें, बाजुओं को जरा ऊपर सरकाया, कंधे पर गमछा रखा और हल्का झुककर, पांचों उंगलियों को सीमेंट की बोरी के नीचे लगाया और एक झटके मैं बोरे को कंधे पर लाद लिया और चल पड़ा मकान के काम पर। दूसरे ने गमछे को 'गोल बनाकर' अपने सिर पर रखा और ईटों की ढेरी में से एक-एक कर पांच ईंटे अपने सिर पर लाद लिए और दबे पाव मकान की ओर बढ़ चला, कि तभी पीछे से आवाज आई 'चाय' मैं पीछे मुड़ा तो काम वाली बाई 'चाय' लेकर खड़ी थी, मैंने चाय ली और फिर खिड़की से बाहर उन मजदूरों का नज़ारा देखने लगा, हर रोज की तरह उन मजदूरों के पास से वो औरत पानी का मटका अपने कमर पर रखकर ले जाती, वो मटका उसके कमर से खिसकता वह फिर से ऊपर चढ़ा लेती, कि तभी पीछे से आवाज आई 'साहब झाड़ू लगा दूं' मैं पीछे मुड़ा और सर को हिलाकर हामी भरी। मैंने देखा उसने झाड़ू को कस के पकड़ा और सरपट सभी कमरों में झाड़ू लगा दिया। अंत में उसने फिर पूछा 'साहब कोई और काम' मैंने कहा 'तुम थकती नहीं हो क्या' उसने कहा 'नहीं साहब' और यह कहकर वह चली गई।
"आज का दिन"..........!!
उसने 'कमीज' के अपने ऊपर के दो बटन खोलें, बाजुओं को जरा ऊपर सरकाया, कंधे पर गमछा रखा और हल्का झुककर, पांचों उंगलियों को बैग के नीचे लगाया और एक झटके में बैग को कंधे पर लाद लिया और चल पड़ा। दूसरे ने गमछे को गोल बनाकर अपने सिर पर रखा और एक-एक करके दो ट्रॉली बैग सिर पर लाद लिए और चल पड़ा। मैंने गौर किया पीछे से 'चाय' की आवाज अब तक नहीं आई, मैंने नजरें खिड़की पर ही रखी, हर रोज की तरह उन मजदूरों के पास से वह औरत गुजरी मगर उसके कमर पर मटके की बजाय 'एक' साल का मासूम बच्चा था, वो बच्चा कमर से खिसकता वह फिर से ऊपर चढ़ा लेती। मैं पीछे मुड़ा सर हिलाकर हामी भरने के लिए मगर पीछे कोई ना था, मैं दोबारा खिड़की की ओर मुड़ा और मैंने देखा मेरी कामवाली बाई ने अपने 'पाँच साल' के बच्चे का हाथ कस कर पकड़ा और सरपट चलने लगी, मैंने मन-ही-मन में पूछा 'तुम थक्को गी नहीं' और जवाब मुझे मालूम था। मैं अंत में खिड़की बंद करने के लिए करीब आया कि तभी मेरे खिड़की के सामने से एक अधेड़ उम्र का बूढ़ा मजदूर 'सर पर बोरी और हाथों में बैग' लिए मुझे दिखा, मैंने चिल्लाकर पूछा "अरे सुनो",'यह बोरिया बिस्तर लेकर कहां की ओर प्रवास कर रहे हो' उसने बड़ी शिद्दत से जवाब दिया "हमने मजदूरी की है, प्रवास नहीं।

राहुल सिंह द्वारा

Sunday, 17 May 2020

शादी In Lockdown PART- 1 "ब्लडी फूल"

से पढ़ने वाले को नमस्कार, हमारा नाम 'फूल कुमार' उर्फ 'चौबे' है। आपसे अनुरोध है, कि ये जो आप आधा पढ़कर आधा छोड़ देते हैं ना, यह बिल्कुल ना करें वरना जो हमें लिख रहा है, वह आपसे नाराज हो जाएंगे।

1 जनवरी 2020, नया साल था और हमने तय कर लिया था, की भईया विवाह तो हम इसी साल करेंगे। बस फिर क्या था पंडित जी को बुलाया गया और मूहूरत तय किया गया, दिन रविवार, तारीख पहली और महिना जून का। हमने उल्टी गिनती गिनना शुरु कर दिया। मगर शनि महाराज जी ने कुंडली तो हमारी पहले ही सेट कर रखी थी, यहां कोरोना ने भारत में दस्तक दिया वहां मोदी जी ने लॉकडाउन का ऐलान किया। हमने अम्मा जी से कहीं 'जब तक लॉकडाउन नहीं खुलेगा तब तक हम विवाह नहीं करेंगे', तभी पिता जी ने भी कही 'फिर तो बेेेेटा हो-ली इस साल तुम्हारी शादी', 'देेेेखो विवाह तो तुम्हारा मुहूर्त पर ही होगा, चाहे जो हो जाए' और लड़कियां खोजना शुरू हो गए, बड़ी मशक्कत के बाद एक लड़की के परिवार वालों से मिलने का तय हुआ। चौबे खानदान की लड़की थी, नाम था "रेहाना" अत्यंत शर्मीली और संस्कारी। हम मन ही मन मुस्काए और शुरू कर दिये हनुमान चालीसा के जगह 'रेहाना' नाम जपना।
अब मिलने का तय तो हो गया था, मगर ना होटल खुला था, ना ढाबा, क्योंकि शहर लॉक डाउन था। फिर तय हुआ कि हम मंगलवार को परिवार सहित पास वाली सब्जी मंडी में मिलेंगे।
 दिन मंगलवार, मैं, मेरे पिताजी, अम्मा और साथ में छोटा भाई, हाथों में झोला, मुंह पर मास्क और पैरों में हवाई चप्पल पहन कर निकल पड़े। हमने उस दिन नंदू भाई के ठेलें वाली खास जींस डाली थी। वो भी अपने मां-बाप और छोटी बहन के साथ आ रही थी।
सब्जी मंडी में पहुंचते ही उसके पिता ने फोन किया 'हम पास की सब्जी मंडी में पहुंच चुके हैं', मेरे पिताजी ने कहा 'हम भी'। अब एक दूसरे को, तो ना हमने देखा था ना उन्होंने और शुरू हुआ 'खोजने का काम'।
मैं हर लड़की को पैनी नजरों से घूर-घूर कर देखू और लड़कियां मुझे देख के मुंह घुमा ले, बड़ा मुश्किल था। मगर इसी क्रम में देखते-देखते एक लड़की से मैं टकरा जो गया, बस फिर क्या था, उसका हाथ और मेरा गाल, "दीया घुमा के"। उस लड़की के पापा मम्मी सब आ गए, मगर मेरे पिता जी, वही खैनी की दुकान पे खैनी मल रहे थे, अम्मा हमेशा की तरह तोरी वाले से लड़ रही थी और छोटा भाई लउनडियाबा....,, खैर छोड़िए। उस लड़की का बाप बोला 'क्या हुआ रेहाना बेटा, क्या हुआ' और लड़की ने जवाब दिया 'पता नहीं ये लफंगा, देहाती, गवार लड़का मेरे से आकर टकरा गया' और अंत में उसने अंग्रेजी के जो दो शब्द कहे "ब्लडी फूल", वह मेरे दिल को ऐसे चुभे मानो 'दिल के अरमा.....,, खैर छोड़िए आपको तो पता ही है। मैंने अपने पिता जी से कहा, 'लड़की देख ली हैं तुरंत घर चलिए' पिताजी ने कहा 'कब, हमें भी तो दिखाओ' हमने कहीं 'विवाह आपको करना है या हमें', और हम सब घर आ गए।
मैंने पिताजी को कोने में लेते हुए पूछा,'आपने तो कही थी लड़की शर्मीली और संस्कारी हैं' पिताजी ने जवाब दिया 'बिल्कुल इसमें कोई शक नहीं, चौबे खानदान की शान है' फिर फुस-फुसाते हुए उन्होंने मुझसे पूछा,'तुम्हें कैसी लगी रेहाना' मैंने लंबी सांस ली और दृश्य याद करते हुए कहा "ब्लडी फूल"

अब देखना यह है, की 'फूल कुमार' क्या 'रेहाना' से शादी करेगा या फिर उसे मना कर देगा।

बहुत-बहुत शुक्रिया, अगला पाट बहुत जल्द।
राहुल सिंह द्वारा

Sunday, 10 May 2020

#मैंने मच्छरों में इंसान को तड़पते देखा है।

बुध पुर्णिमा से एक दिन पहले की वो रात थी, मेरे घड़ी में रात के 9 बज रहे थे, और टीवी में चौधरी जी का DNA चल रहा था, हमेशा की तरह वह खबरों को संप्रदायवाद के तेल में तलने का काम कर रहे थे और मैं रोटी में बैगन का भरता भरकर दही में डुबोकर साथ में आम का अचार भी खा रहा था। वो एक एक निवाला मेरे जीब को स्वाद दे रहा था, मगर चौधरी जी का DNA आज कुछ खास ना लग रहा था। मैंने खाना खत्म किया और आधे पे ही टीवी बंद कर दिया। माँ ने आखिर में दूध भी थमा दिया, मैंने बड़े ही मुश्किल से दूध को भी अपने पेट में थोड़ी जगह दे दी और चल पड़ा अपने बिस्तर की ओर। मेरी अक्सर रात में लाइट जलाकर सोने की आदत है, उस रात मच्छर बहुत थे, मैंने कीड़े और मच्छर मारने वाला स्प्रे अपने रूम में स्प्रे किया और कुछ देर बाद सोने की कोशिश की, क्योंकि बैगन का भरता और रोटी मेरे पेट में आपस में लड़ाई कर रहे थे, दूध और दही आपस में मिलकर रह रहे थे और आम का अचार इन सब का लुफ्त उठा रहा था। बड़ी मुश्किल से मुझे नींद आई मगर फिर रात के ठीक 3 बजे मेरी आंख खुली, मैं फिर सोने के लिए करवट बदलने लगा की तभी मेरी नजर जमीन पर पड़ी, मैंने देखा कई सारे मच्छर उस स्प्रे के कारण जमीन पर तड़प रहे थे, ऐसे लग रहा था जैसे वह सांस के लिए तड़प रहे हो, कुछ थोड़ा बहुत उड़कर गिर जा रहे थे, हर मच्छरों के चारों तरफ चीटियां लगी हुई थी, और जो मर गए थे उन्हें चीटियां उठाकर ले जा रही थी, ऐसा लग रहा था जैसे मानो वो मच्छर मुझसे मदद मांग रहे हो, मगर मैं उनको बचा ना सका। एक मिनट आप कही इमोशनल तो नहीं हो गए, अरे मच्छर थे वो, इंसान नहीं। मैं फिर से सो गया और सुबह उठते ही पहले मैंने अपने पेट से उन शरारती तत्वों को बाहर निकाला। घड़ी में सुबह के ठीक 9 बज रहे थे और टीवी में चौधरी जी तो नहीं आ रहे थे, मगर कुछ खबरे आ रही थी, ठीक वैसी ही जो कल रात मैंने 3 बजे देखा। आंध्र प्रदेश के वेंकट पुरम के पास ठीक 3 बजे सटाईरिन (styarin) गैस लीक हुई, कई सारे लोग उस गैस के कारण जमीन पर तड़प रहे थे, ऐसे लग रहा था जैसे वह सांस के लिए तड़प रहे हो, कुछ थोड़ा बहुत चल कर गिर जा रहे थे, हर लोगों के चारों तरफ स्वास्थ्य कर्मी लगे हुए थे, और जो मर गए थे उन्हें स्वास्थ्य कर्मी उठाकर एंबुलेंस में ले जा रहे थे, ऐसा लग रहा था जैसे मानो वो लोग मुझसे मदद मांग रहे हो, मगर मैं उनको बचा ना सका। एक मिनट कहीं आप फिर से इमोशनल तो नहीं हो गए, अरे इंसान थे वो, मच्छर नहीं, इमोशनल होइए। उस रात मैंने उन मच्छरों में इंसान को तड़पते हुए देखा।
आंध्र प्रदेश में गैस रिसाव के कारण मारे गए लोगों को श्रद्धांजलि और नमन।

धन्यवाद, राहुल सिंह द्वारा

Thursday, 7 May 2020

#आओ चटपटी 'खबर' पकाएं

प अगर सोच रहे हैं 'खबर' कोई स्वादिष्ट सा पकवान है, तो माफ करिएगा आप बिल्कुल गलत सोच रहे हैं। दरअसल मैं यहां किसी 'खाने' या फिर किसी 'पकवान' के बारे में बात नहीं कर रहा हूँ, मैं यहां 'खबर' अर्थात 'समाचार' जो हम टीवी में सुनते हैं, देखते हैं, उसकी बात कर रहा हूं।
तो आइए शुरू करते हैं, 'खबर' पकाने का सिलसिला,-
'चटपटी खबर' पकाने के लिए सामग्री में चाहिए- संप्रदायवाद तेल, बाइट मसाला, राजनीतिक मसाला, ट्विटर मसाला, आवाज गरम मसाला और खुद से बना हुआ कोई भी मसाला।

तो 'चटपटी खबर' पकाने के लिए सबसे पहले आपको बाहर जाना पड़ेगा, यानी की बाजार में, जहां आपको तरह-तरह की खबरें मिलेंगी जैसे- आर्थिक मंदी, गरीबी, लाचार मजदूर, बेरोजगारी, राजनीति, चुनाव, सामाजिक अपराध, चोरी डकैती, रेप, महामारी, आपदा, आतंकवादी हमला, कालाबाजारी, मॉब लिंचिंग आदि। अब आपको ऐसी खबरें उठाकर लानी है जिसको लोग अधिक से अधिक देखना पसंद करें, यानी कि जिससे TRP बड़े। अब अधिकतर मीडिया को सबसे ज्यादा राजनीतिक, चुनाव, आतंकवादी हमले, सामाजिक अपराध, चोरी-डकैती, रेप, मॉब लिंचिंग जैसी खबरें ही पसंद आती है।
अब शुरू होता है खबरों को पकाने का काम। मान लीजिए आप कोई भी 'खबर' को पकाना चाहते हैं, तो उसके लिए सबसे पहले आपको संप्रदायवाद तेल में 'खबर' को अच्छे से तलना पड़ेगा, अच्छे से तलने के बाद उसमें राजनीतिक मसाला डालिए, ध्यान रहे राजनीतिक मसाला अगर आप 'कांग्रेस' कंपनी का डालेंगे तो खबर ओर भी ज्यादा चटपटी बनेगी। इसके बाद ट्विटर मसाले का डब्बा खोलिए, उसमें आपको तरह-तरह के बयान मसाले मिलेंगे, आपको जो सबसे ज्यादा विवादित बयान लगे उसे आप उठा कर डाल दीजिए, फिर आप अगर खबर का चटपटा पन ओर बढ़ाना चाहते हैं तो उसमें किसी बड़े नेता का 'बाइट मसाला' डाल दीजिए। और अंत में आप अपने खबर को 'आवाज गरम' मसाले के साथ चैनल प्लेट मैं परोसीए और स्वाद में फिर भी कोई कमी रेह जाए, तो अपने से कोई भी मसाला बनाकर डाल दीजिए, हालाकि यह मसाला नहीं डालना चाहिए।

तो चटपटी खबर बनाना तो आप सीखे गए होंगे मगर आपसे एक सवाल, खबर को आप कच्चा देखना पसंद करते हैं या फिर उसे पका हुआ देखना पसंद करते हैं, उम्मीद करता हूं आप खबरों को कच्चा ही देखना पसंद करते होंगे, यानी कि जो खबर जैसी है वैसी ही दिखाइ जाए, हां मैं ये नहीं कह रहा कि खबरों में मसाला बिल्कुल मत लगाइए, लगाइए मगर थोड़ा कम। और बाजार से खबरें वह लाइए जो लोकतंत्र के पेट के लिए जरूरी हो, ना कि आपके(मीडिया) पेट के लिए।
अंत में यही कहना चाहूंगा, खबरों को पकाइए मत उसे जैसा है वैसा ही लोकतंत्र के सामने परोसीए।
नोट:- BJP वालों के लिए 'खबरें' थोड़ा कम बनाया करें,
'आवाज गरम मसाले' का प्रयोग तो बिल्कुल ना कर।

धन्यवाद, राहुल सिंह द्वारा

Wednesday, 6 May 2020

#मेरा ब्रेकअप और लॉक डाउन

बड़ी जिद्दी थी वो, जो चाह लेती थी वह मुझसे करवा कर ही मानती थी, उसके फरमाइशो की कोई सीमा ना थी, और यूं ही एक दिन मुझे उसका फोन आया और उसने फरमाया, बेबी आज शाम को कहीं बाहर खाना खाने चलें, उसका इतना सा यू कहना और इस पर मेरा ना कर देना ऐसा तो हो सकता नहीं था, मैंने कहा अच्छा ठीक है एक बात तो सुनो, इतने पर ही उसने मेरा फोन काट दिया। 
बस फिर क्या था 5 बजे की वो शाम थी सूरज ढलने की राह पर था, वो और मैं खाने की टेबल पर बैठे एक दूसरे को बस टक-टकी लगाए देखी जा रहे थे, ना वो कुछ बोल रही थी और ना मैं। उसके प्लेट में पाँच पानी-पूरीया थी और मेरी थाली खाली थी बगल में एक चम्मच और प्याली रखी हुई थी। तभी मुझे वो बात याद आई जो मैं उससे फोन पर कहना चाहता था मैंने बोला अच्छा सुनो, इतने पर ही उसने बोला चुप रहो, मुझे अब पानी-पुरी खाने दो। उसने खाना शुरू किया कि तभी पुलिस आ गई, मैंने पुलिस को देखा और हाथों में चम्मच उठा लिया, पुलिस ने मुझे देखा और हाथों में डंडा उठा लिया, फिर मैंने पुलिस को देखा और दूसरे हाथ में अपनी थाली उठाली और चम्मच से थाली को पीटने लगा पर फिर पुलिस ने मुझे देखा और डंडा उठाया और वो मेरी गर्लफ्रेंड को पीटने लगा।
बस फिर क्या था, वह 5 बजे की शाम मेरी जिंदगी के लिए ब्रेकअप की शाम साबित हो गई। और आज मैं लॉक डाउन में बैठा उसके लिए अफसोस करता हूं कि काश उसने मेरी बात सुन ली होती जो मैं फोन पर कहना चाहता था, कि वह तारीख थी रविवार 22 मार्च की और दिन था जनता कर्फ्यू का।
शुक्रिया शुक्रिया
सीख:- लड़कियों को ज़िद थोड़ी कम करनी चाहिए

राहुल सिंह द्वारा....