Tuesday, 6 October 2020

इस बार नहीं बरसेगा माता का आशीर्वाद 'आत्मनिर्भर भारत' पर

 सुंदर-सुंदर पंडाल, ऊंची-ऊंची दुर्गा माता की प्रतिमा, धूप-अगरबत्ती की चारों ओर फैली मनमोहक सुगंध, कान में बजते भजन, लोगों की भीड़, रंग-बिरंगी दुकाने और हर दो कदम पर ठेले वालों की गूंजती आवाज आइए 50 रुपए,..! आइए 100 रुपए,..! कोई गुब्बारे बेचता, तो कोई चूड़ियां बेचता, तो कोई खिलौने बेचता। ठीक ऐसा ही हर साल देखने को मिलता था दुर्गा पूजा के महापर्व पर।
मगर इस साल कोरोना वायरस के समय में यह सब कल्पना बनकर रह जाएंगे। क्योंकि हालही में भोजपुर जिला के SDM ने ये ऐलान किया हैं, की भारत सरकार द्वारा कोविड-19 के सुरक्षात्मक उपाय आदर्श आचार संहिता के अनुसार ही कोई भी पर्व मनाया जाएगा, उन्होंने कहा गणेश चतुर्थी, मुहर्रम, रामनवमी इत्यादि को संयमित तरीके से मनाया गया है, तो अब दुर्गा पूजा को भी संयम के साथ मनाना है। महामारी को देखते हुए पंडाल लगाकर मूर्तियां बैठाने की अनुमति नहीं होगी जिन्हें मूर्तियां स्थापित करनी है, वह अपने घरों में इसका आयोजन कर सकते हैं। इसके अलावा 'चेहल्लुम' जो कि एक मुसलमानों का त्यौहार है इस पर भी किसी प्रकार का जुलूस नहीं निकाले जाएंगे।
लीजिए एक तरफ जहां मोदी जी आत्मनिर्भर भारत के तहत MSME का कल्याण करना चाहते हैं, तो वही कोरोना वायरस हर बार बीच में टांग अड़ा ही देता है।
आइए जानते हैं किस-किस के पेट पर लात पड़ेगी दुर्गा पूजा के आयोजन ना होने से,
जैसा कि मैंने शुरूआती में जिक्र किया 'सुंदर-सुंदर पंडाल' ये लगाने वाले उन सभी ठेकेदारो की आमदनी इस बार नहीं होगी। ऊंची-ऊंची दुर्गा माता की प्रतिमा बनाने वाले उन सभी मूर्तिकारो की पेट इस बार कटने वाली हैं। जब मूर्तियां नहीं होगी तो पूजा भी नहीं होगी और पूजा नहीं होगी तो धूप, अगरबत्ती की खरीदी में गिरावट आएगी परिणाम स्वरूप कुटीर उद्योग कंपनियों को बड़ा घाटा सहना पड़ सकता है। माता की मूर्ति के सजावट में तमाम तरह की चीजों का उपयोग होता है जैसे की चुनरी, कपड़े, माला, कागज, रंग बिरंगी लाइट आदि इन सब का उत्पादन कुटीर उद्योगों द्वारा पूजा के दो-तीन महीने पहले से ही शुरू हो जाता है, मगर इस बार यह उम्मीद कम नजर आ रही है।
और सबसे बड़ी मार उन लघु उद्योगपतियों को झेलनी पड़ेगी जो छोटे-छोटे खिलौने, चूड़ियां, माला, झूमके, मूर्तिया आदि वस्तुएं ठेलो पर सजा कर बेचा करते थे।
हर किसी को त्योहार, पर्व का इंतजार रहता है, क्योंकि ऐसे बड़े पर्व, छोटे बड़े व्यापारियों के लिए एक अच्छा कमाई का साधन प्रतीत होते हैं, मगर अफसोस इस बार यह सब कुछ संभव हो पाना मुश्किल है।
मगर वहीं दूसरी ओर हम इसके अच्छे परिणामों की बात करें, तो यह कहना गलत नहीं होगा कि जिस समय भारत कोरोना वायरस से अपने एक लाख से भी अधिक लोगों की जान गंवा चुका है, और 66 लाख से अधिक लोग इससे संक्रमित हैं, तो ऐसे में यह कदम सराहनीय साबित होगा, क्योंकि जब तक वैक्सीन नहीं निकलती तब तक हमें इस तरह चेतावनी के साथ काम करना पड़ेगा, और यह पहली बार नहीं है, इससे पहले भी कई विशाल पर्व संयम के साथ मनाए जा चुके हैं। अंत में मैं बस यही कहना चाहूंगा की जरूरत है, हमें इस वायरस को फैलने से रोकने की और लोगों की जान बचाने की, क्योंकि जब जान होगा तो यह जहांन होगा इसीलिए 'जब तक कोरोना है, घरों में रहना है'।

नमस्कार, राहुल सिंह द्वारा

No comments:

Post a Comment