Wednesday, 22 July 2020

मेरे मन कि आवाज

इसे आप लोग पूरा पढ़ेंगे या नहीं उससे मुझे कोई मतलब नहीं, मगर मैं जो लिखने जा रहा हूं वह मेरी अंतरात्मा की आवाज है।
पता है, सबसे ज्यादा अफसोस कब होता है जब आप किसी से उम्मीद लगाते हैं पर वह आपकी उम्मीदों को नजरअंदाज कर दे, आपकी उम्मीद पर खरा ना उत्तरे, तब होता है सबसे ज्यादा अफसोस। जब आपके परिवार के साथ या आपके साथ कुछ गलत होता है तब सबसे ज्यादा आपकी उम्मीदें किस से होती है पुलिस प्रशासन से। मगर जरा सोचिए एक आम इंसान भला क्या कर लेगा अगर येही आपकी मदद ना करें तो, कुछ कर लेंगे क्या।
पता है दिक्कत क्या है। इस कलयुग में किसी भी लड़की को छेड़ना, उसे गाली देना या अभद्र भाषा का प्रयोग करना यह सब एक आम बाते हो चुकी है, यह सब चलता है, पुलिस को भी यही लगता हैं तभी पुलिस इनके खिलाफ कोई कारवाई नहीं करती और होता क्या है, वह सभी मनचले लड़के जो यह करते हैं उनको बढ़ावा मिलता है और परिणाम में वह कल को निर्भया, कठुआ, प्रियंका रेड्डी जैसे कांड करते हैं। अगर आप भी 'लड़की छेड़ना' और 'लड़की का रेप होने' में फर्क ढूंढते हैं तो कसम से आप भारत में रेप को कभी रोक नहीं पाएंगे। मगर चुक कहां हो जाती है, वही हो जाती है जहां पुलिस फर्क ढूंढने लग जाती है 'लड़कियों को छेड़ने' जैसी बात को एक छोटा अपराध समझ बैठती हैं, और 'रेप' को एक बड़ा अपराध।
एक साल पहले की बात है, उत्तर प्रदेश के 'गाजियाबाद' में एक पत्रकार जिसका नाम 'विक्रम जोशी' था, उसकी बेटियों को कुछ आवारा मनचलों ने छेड़ा, विक्रम ने थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई और उम्मीद लगा कर बैठे की पुलिस प्रशासन कुछ ना कुछ तो करेगी, मगर उसे यह नहीं पता था की पुलिस के लिए यह एक आम बात है। एक साल बीत गया मनचलों की हिम्मत बढ़ी और उन्होंने विक्रम की बेटियों को फिर छेड़ा घर के पास गाली गलौज की। एक बार फिर विक्रम ने पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई, मगर फिर पुलिस चुप रही। विक्रम उम्मीद लगाकर बैठे रहे। मगर मनचलों की हिम्मत इस बार कुछ इस प्रकार बढ़ी कि उनके इरादे कुछ ऐसे थे।
"हम तुम्हारी बहन, बेटियों को छेड़ेंगे, उन्हें गालियां देंगे, गंदी गंदी बातें कहेंगे मगर तुम विरोध मत करना यह सब हम तुम्हारे सामने करेंगे, तुम्हारे घर में घुसकर करेंगे मगर तुम विरोध मत करना अगर करोगे तो" !!
दिनांक 20 जुलाई रात के करीब 10 बजकर 30 मिनट के पास 'विक्रम जोशी' को उन्हीं मनचलों ने उसही के घर के पास सड़क पर उसकी मोटरसाइकिल रोककर उसही की बेटियों के सामने उसे पीटा और सर में गोली मार दी।
अफसोस सिर्फ इस बात का है, की जितनी हिम्मत यह मामूली गुंडे दिखाते हैं ना, उतनी ही हिम्मत पुलिस दिखाने लग जाए तो, आज दुनिया के कई बड़े बड़े अपराध होने से बच जाए। यह बहुत बड़ी बात कह दी मैंने, जबकि हकीकत इससे बहुत परे है। हकीकत में पुलिस इंतजार करती है, खून बहने का, आंसू बहने के और फिर गिरफ्तार करती है। अंत में गया किसका, पुलिस का,,?? 'कुछ नहीं',, आपका गया सब, अब थोड़ा आसु बहाईए, एक मिनट कहीं आपको "System" पर गुस्सा तो नहीं आ रहा, अच्छा ये लीजिए 'दस लाख' रखिए जेब में, और खुश रहिए। और हां,, खबरदार जो "System" बदलने की कोशिश की तो, वो तुम्हारे औकात के परे है।

नमस्कार, राहुल सिंह द्वारा

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