Friday, 9 October 2020

ये फिर कहीं बदले की आग तो नहीं

 मुंबई के पुलिस कमिश्नर 'परमवीर सिंह' और उनकी टीम को मैं बधाई देना चाहूंगा, कि उनकी नींद केवल तब जाकर खुली जब 'रिपब्लिक भारत' चैनल तीन, चार हफ्तों से TRP में टॉप पर रहने लगा। आश्चर्य मुझे इस बात का है, कि इस तरह का मामला इससे पहले कहीं देखने को नहीं मिला, जब 'आज तक' या अन्य चैनल TRP में टॉप पर रहते थे। मगर नहीं-नहीं ये बदले की आग तो नहीं हो सकती। मगर जब मैं फिर गहराई से सोचता हूं, कि क्या केवल मुंबई के कुछ घरों के सेटअप बॉक्स में TRP डिवाइस को लगाने से और उनको पाँच सौ रुपये देकर 'रिपब्लिक चैनल' चला कर रखने से क्या रिपब्लिक चैनल नंबर वन पर आ सकता है। हमें जरा गौर फरमाना होगा TRP केवल एक राज्य के कैलकुलेशन से नहीं आती, बल्कि ये पूरे भारतवर्ष में करीब चालीस हजार घरों मे लगाकर की जाती है। अब कोई अगर ये कहेगा कि अर्नब गोस्वामी ने अपना चैनल छोड़कर पूरे भारतवर्ष में पाँच-पाँच सौ रुपये बटवाए होंगे, तो यह बात हजम कर पाना तो मुश्किल होगा। हजम कर पाने से याद आया, बात तो हजम तब भी नहीं हुई थी, जब BMC को पूरे मुंबई में केवल कंगना रनौत का दफ्तर ही अवैध दिखा था, और उसे तुड़वाया भी गया था, हकीकत में BMC को कंगना का दफ्तर केवल इसीलिए अवैध दिखा, क्योंकि कंगना ने उद्धव ठाकरे यानी कि शिव सेना की जमकर आलोचना की थी। अब अगर पावर का इस्तेमाल करना सीखना है तो कोई शिव सेना से सीखे, क्योंकि जब इसी सरकार के नेता 'संजय राउत' मीडिया के सामने इसी अभिनेत्री को खुलेआम गाली देते हैं, तो उनका कुछ नहीं होता, मगर जब कंगना रनौत ने बिना गाली दिए शिवसेना की थोड़ी आलोचना क्या कर दी, तो इनका दफ्तर BMC के द्वारा तोड़ दिया गया। कमाल की है यह सरकार अपना बदला छोड़ती नहीं है, तभी तो देखिए ना एक नेवी से रिटायर्ड बुजुर्ग व्यक्ति ने इनके किसी नेता को एक कार्टून क्या फॉरवर्ड कर दिया, उस बुजुर्ग को शिव सेना के कुछ कार्यकर्ताओं ने तो दौड़ा-दौड़ा कर मारा उसकी आंखें सुझा दी।

तो अब आप अंदाजा लगा ही चुके होंगे की जिसने भी इनके खिलाफ आवाज उठाई है, उनका क्या हश्र हुआ। बचे रह गए थे, तो सिर्फ 'अर्नब गोस्वामी' जिन्होंने उद्धव ठाकरे की और इनके पार्टी के अन्य नेताओं की भर भर के आलोचना की है। ऐसे में मुंबई पुलिस के द्वारा खेला गया TRP फर्जीवाड़ा का पत्ता, कहीं शिव सेना की 'बदले की आग तो नहीं' क्योंकि गली के गुंडे हो, या BMC के अधिकारी, या चाहे मुंबई पुलिस के कमिश्नर हो, सबका मालिक एक हैं, शिव 'भगवान' माफ करिएगा 'सेना'।
अंत में रही बात अर्णब गोस्वामी की तो यह किसी से छुपा नहीं है, कि उनकी पत्रकारिता मोदी सरकार के पक्ष में होती है। वह मुद्दों को उठाते हैं, मगर उद्देश्य उनका सच्चाई को सामने लाना कम जरूरी होता है, बल्कि उन मुद्दों से खुद को 'सनातनी' और 'राष्ट्रवादी' दिखाना ज्यादा जरूरी होता है। उनका 'सुशांत सिंह राजपूत' को इंसाफ दिलाने की मुहिम तो फेल हो गई, मगर एक बात कहूंगा, कि उनकी इस मुहिम ने गहरी नींद में सो रही मुंबई पुलिस के पैर के नीचे चल रही 'ड्रगवुड इंडस्ट्री' को उजागर जरूर कर दिया है।
मैं उम्मीद करता हूं, कि यह 'बदले की आग' नहीं होगी, मुंबई पुलिस सबूतों के साथ इस इल्जाम को कोर्ट में साबित जरूर करेंगी।

शुक्रिया, राहुल सिंह द्वारा

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