Sunday, 11 October 2020

क्या 'राम' का 'चिराग' अपना भाग्य चमकाएगा

 74 वर्षीय 'रामविलास पासवान' पिछले कुछ समय से बीमार चल रहे थे, 22 अगस्त को 'फोर्टिस अस्पताल' में भर्ती हुए, 3. अक्टूबर को दिल का ऑपरेशन किया गया, उनकी स्थिति सुधरने लगी थी, जिसके बाद उनकी एक और सर्जरी अभी बाकी थी। लेकिन 8,अक्टूबर, गुरुवार की शाम उनकी तबीयत अचानक खराब हो गई और डॉक्टरों की तमाम कोशिशों के बाद भी उन्हें नहीं बचाया जा सका।

राम विलास पासवान जी का जन्म आजादी के एक साल पहले 5, जुलाई 1946 में 'खगड़िया' के एक छोटे से गांव 'शहरबन्नी' मैं हुआ। 1983 में पासवान जी ने दलितों के उत्थान के लिए दलित सेना का संगठन खड़ा किया, जिस वजह से वह राष्ट्रीय राजनीति पर छा जाने वाले दलित राजनीति के सबसे लोकप्रिय चेहरा बन गए।
'गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड' में अपना नाम दर्ज करा चुके, रामविलास पासवान के नाम छे प्रधानमंत्रियों के मंत्री मंडल में काम करने का रिकॉर्ड भी दर्ज हैं।
1989 रामविलास जी पहली बार हाजीपुर से JD(NF) से जीते और प्रधानमंत्री 'विश्वनाथ प्रताप सिंह' की कैबिनेट में केंद्रीय 'श्रम' और 'कल्याण' मंत्री बने। फिर
(2). JD(U) से पीएम इंद्र कुमार गुजराल,(3). JD(U) से पीएम एचडी देवगौड़ा, (4). NDA से पीएम अटल बिहारी वाजपेई (5). UPA से पीएम डॉ.मनमोहन सिंह और फिर (6). NDA से पीएम नरेंद्र मोदी की कैबिनेट में केंद्रीय 'उपभोक्ता मामले','खाद्य' और 'सार्वजनिक वितरण प्रणाली' मंत्री रहे।
इसमें कोई शक नहीं, की रामविलास पासवान भाग्य के बड़े बलशाली थे, वो छे 'प्रधानमंत्रियों' के कार्यकाल में बतोर कैबिनेट मिनिस्टर रहे। मगर यही बात जब उनके बेटे 'चिराग पासवान' से एक इंटरव्यू के दौरान कही गई, तो उन्होंने इससे साफ इंकार कर दिया, चिराग ने कहा कि वह भाग्यशाली नहीं थे, कि वो 6 प्रधानमंत्रियों के कार्यकाल में बतोर कैबिनेट मिनिस्टर रहे, बल्कि वो जिस-जिस पार्टियों से जुड़ते थे, वह पार्टियां मेरे पिता के भाग्य से जीत जाती थी, तब जाकर वह उनके कार्यकाल में कैबिनेट मिनिस्टर बनते थे।
आपको बता दें बिहार चुनाव में इस बार चिराग पासवान की पार्टी 'लोक जनशक्ति पार्टी' (LJP) का गठबंधन BJP से है, हालांकि BJP का गठबंधन JDU से भी है। मगर चिराग अपने सारे उम्मीदवार JDU के विपक्ष में उतारेंगे।
अब ऐसे में दो बड़े सवाल उठते है, 'पहला' -क्या बिहार की जनता चिराग के पिता 'रामविलास पासवान' के देहांत की सहानुभूति चिराग को 'वोट' डाल कर देगी।
'दूसरा' -पिता के देहांत के बाद, क्या चिराग उनके भाग्य की गरिमा को कायम रख पाएंगे, क्या उसे ओर आगे तक बढ़ाएंगे या फिर फेल हो जाएंगे।
फिलहाल तो इन सवालों के जवाब परिणामों की घोषणा के बाद ही पता चल पाएंगे। तब तक के लिए 'चिराग पासवान' और उनके परिवार को हमारा ढेर सारा प्यार।

नमस्कार, राहुल सिंह द्वारा

Saturday, 10 October 2020

वो कैमरे वाला लड़का

जमीन पर बैठकर दाहिने हाथ की पहली अंगुली से माटी को कुरेदती रहती, वो लड़की मैहेज तीन साल की थी, चेहरे का रंग सावला, और बदन पर आधे कपड़े। मेरी उम्र भी कोई ज्यादा नहीं थी, मैं पाँच साल का था। उघारे बदन पर सिर्फ जांगिया पहने नंगे पांव खड़े होकर, उसकी इस हरकत को टकटकी लगाए देखता, हर रोज अंग्रेज के बड़े अधिकारी आते, उस लड़की को लात मारते और मुझसे अंग्रेजी के दो,तीन बोल बोल जाते "hey you, take care of her, she is your wife, you are married" उनकी ये अंग्रेजी मुझे खूब भली-बुरी लगती। एक दिन गांव के 'रामू काका' जो उनकी अंग्रेजी समझते थे, उन्होंने मुझे बताया 'कि तुम और ये लड़की दोनों शादीशुदा हो, तुम्हें इसका ख्याल रखना है, वरना यह अंग्रेज इसे परेशान करेंगे' मुझे 'शादीशुदा' का अर्थ उतना तो नहीं मालूम था, मगर ख्याल रखना है, यह बात मैंने गाठ बांध ली थी। खेलने-कूदने की उम्र में मेरे माथे पर उस लड़की की जिम्मेदारी आ गई थी, अब मैं भी उसकी खुशी के लिए उसके साथ जमीन पर बैठकर अंगुली से माटी को कुरेदा करता।

1961 मैं हमारी शादी कागजों में गढकर पक्की कर दी गई। मेरी उम्र 21 बरस हो चुकी थी, उस लड़की को मैंने अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार कर लिया था। अब रोजगार की उम्मीद में हम युपी से दिल्ली की ओर चल पड़े। दिल्ली में यमुना किनारे हमारा बसेरा था। चार पहियों वाले ठेले पर मैं सेब, अनार, और केले बेचा करता। जिंदगी का पहिया धीमे-धीमे बढ़ रहा था, हमारे दो बच्चे हो चुके थे, वो जवान हो रहे थे और हम अब ढल रहे थे। चार पहियों वाली फल की ठेली से अपने परिवार का गुजारा कर पाना मुश्किल हो रहा था। 50 साल की उम्र में मैंने अब अपना एक ढाबा खोला जिसका नाम मैंने 'बाबा का ढाबा' रखा। जिंदगी का ढाबा धीमे-धीमे चल रहा था, दिन तेजी से घट रहे थे, उम्र तेजी से घठ रही थी, दाढ़ी, मूंछ और सर के बाल भी सफेद हो चुके थे, मगर ढाबे की गति अब भी धीमी थी। मेरी उम्र अब 80 बरस हो चुकी थी और एक दिन मैं अपने ढाबे पर रोटियां सेक रहा था, कि तभी एक अमीर घराने का लड़का हाथों में कैमरा लिए वही अंग्रेजी के बोल बोलते हुए मेरे ढाबे के पास आया और मेरे ढाबे के पकवानों को 'अंग्रेजी के शब्दो में गुनगुनाते' हुए फिल्मआने लगा, मैंने उससे कहा 'बेटा अगर हिंदी में बोलोगे तो मैं भी समझ पाऊंगा', उसने दोबारा से हिंदी में बोलकर मेरे पकवानों को फिल्मआना शुरू किया, मेरी आंखों में आंसू आ गए।

अगले ही दिन जब मैं दोबारा अपने ढाबे की ओर चला तो दूर से देखा मेरे ढाबे के पास करिब सौ लोगों की भीड़ जुटी थी, मुझे लगा कोई दुर्घटना हुई है, मगर जब मैं करीब पहुंचा तो वह सब मुझसे कहने लगे "अरे बाबा, जल्दी खोलिए ढाबा, बड़ी तेज की भूख लगी है" 'खोलिए', 'खोलिए'...! मेरे चेहरे पर हल्की सी मुस्कुराहट थी और आंखों में आंसू मैंने झट से कहा "हां,हां, अभी खोलता हूं बेटा"। उस 'कैमरे वाले लड़के' ने मेरी जिंदगी बदल दी।
जिंदगी में सफलता आपको एक ना एक दिन जरूर मिलेगी चाहे 30 साल में मिले, 50 में, 70 में या मेरी तरह 80 साल की उम्र में, बशर्ते आपको उम्मीद और मेहनत करना नहीं छोड़ना है।

अंत में यह सुनकर मैंने अपना कैमरा बंद किया और बाबा का शुक्रियाअदा किया कि उन्होंने अपनी जीवन की इतनी खूबसूरत दास्तां हमें सुनाईं, मैं चलने के लिए जब खड़ा हुआ तो अचानक मेरी नजर 'अम्मा' पर पड़ी, मैंने देखा वो कसी सोच में खोई हुई है और उनके दाहिने हाथ की पहली उंगली वहीं जमीन को कुरेदने में लगी हुई है, मैं मन ही मन मुस्कुराया और वहां से चल पड़ा।

राहुल सिंह द्वारा

Friday, 9 October 2020

ये फिर कहीं बदले की आग तो नहीं

 मुंबई के पुलिस कमिश्नर 'परमवीर सिंह' और उनकी टीम को मैं बधाई देना चाहूंगा, कि उनकी नींद केवल तब जाकर खुली जब 'रिपब्लिक भारत' चैनल तीन, चार हफ्तों से TRP में टॉप पर रहने लगा। आश्चर्य मुझे इस बात का है, कि इस तरह का मामला इससे पहले कहीं देखने को नहीं मिला, जब 'आज तक' या अन्य चैनल TRP में टॉप पर रहते थे। मगर नहीं-नहीं ये बदले की आग तो नहीं हो सकती। मगर जब मैं फिर गहराई से सोचता हूं, कि क्या केवल मुंबई के कुछ घरों के सेटअप बॉक्स में TRP डिवाइस को लगाने से और उनको पाँच सौ रुपये देकर 'रिपब्लिक चैनल' चला कर रखने से क्या रिपब्लिक चैनल नंबर वन पर आ सकता है। हमें जरा गौर फरमाना होगा TRP केवल एक राज्य के कैलकुलेशन से नहीं आती, बल्कि ये पूरे भारतवर्ष में करीब चालीस हजार घरों मे लगाकर की जाती है। अब कोई अगर ये कहेगा कि अर्नब गोस्वामी ने अपना चैनल छोड़कर पूरे भारतवर्ष में पाँच-पाँच सौ रुपये बटवाए होंगे, तो यह बात हजम कर पाना तो मुश्किल होगा। हजम कर पाने से याद आया, बात तो हजम तब भी नहीं हुई थी, जब BMC को पूरे मुंबई में केवल कंगना रनौत का दफ्तर ही अवैध दिखा था, और उसे तुड़वाया भी गया था, हकीकत में BMC को कंगना का दफ्तर केवल इसीलिए अवैध दिखा, क्योंकि कंगना ने उद्धव ठाकरे यानी कि शिव सेना की जमकर आलोचना की थी। अब अगर पावर का इस्तेमाल करना सीखना है तो कोई शिव सेना से सीखे, क्योंकि जब इसी सरकार के नेता 'संजय राउत' मीडिया के सामने इसी अभिनेत्री को खुलेआम गाली देते हैं, तो उनका कुछ नहीं होता, मगर जब कंगना रनौत ने बिना गाली दिए शिवसेना की थोड़ी आलोचना क्या कर दी, तो इनका दफ्तर BMC के द्वारा तोड़ दिया गया। कमाल की है यह सरकार अपना बदला छोड़ती नहीं है, तभी तो देखिए ना एक नेवी से रिटायर्ड बुजुर्ग व्यक्ति ने इनके किसी नेता को एक कार्टून क्या फॉरवर्ड कर दिया, उस बुजुर्ग को शिव सेना के कुछ कार्यकर्ताओं ने तो दौड़ा-दौड़ा कर मारा उसकी आंखें सुझा दी।

तो अब आप अंदाजा लगा ही चुके होंगे की जिसने भी इनके खिलाफ आवाज उठाई है, उनका क्या हश्र हुआ। बचे रह गए थे, तो सिर्फ 'अर्नब गोस्वामी' जिन्होंने उद्धव ठाकरे की और इनके पार्टी के अन्य नेताओं की भर भर के आलोचना की है। ऐसे में मुंबई पुलिस के द्वारा खेला गया TRP फर्जीवाड़ा का पत्ता, कहीं शिव सेना की 'बदले की आग तो नहीं' क्योंकि गली के गुंडे हो, या BMC के अधिकारी, या चाहे मुंबई पुलिस के कमिश्नर हो, सबका मालिक एक हैं, शिव 'भगवान' माफ करिएगा 'सेना'।
अंत में रही बात अर्णब गोस्वामी की तो यह किसी से छुपा नहीं है, कि उनकी पत्रकारिता मोदी सरकार के पक्ष में होती है। वह मुद्दों को उठाते हैं, मगर उद्देश्य उनका सच्चाई को सामने लाना कम जरूरी होता है, बल्कि उन मुद्दों से खुद को 'सनातनी' और 'राष्ट्रवादी' दिखाना ज्यादा जरूरी होता है। उनका 'सुशांत सिंह राजपूत' को इंसाफ दिलाने की मुहिम तो फेल हो गई, मगर एक बात कहूंगा, कि उनकी इस मुहिम ने गहरी नींद में सो रही मुंबई पुलिस के पैर के नीचे चल रही 'ड्रगवुड इंडस्ट्री' को उजागर जरूर कर दिया है।
मैं उम्मीद करता हूं, कि यह 'बदले की आग' नहीं होगी, मुंबई पुलिस सबूतों के साथ इस इल्जाम को कोर्ट में साबित जरूर करेंगी।

शुक्रिया, राहुल सिंह द्वारा

Thursday, 8 October 2020

सुशांत की गाड़ी, आत्महत्या से चली और आत्महत्या पर ही आ रुकी, नहीं मिली इंसाफ की मंजिल

 14 जून 2020 भारत में सनसनी की तरह एक खबर फैली, 'बॉलीवुड स्टार सुशांत सिंह राजपूत ने अपने घर में पंखे से लटक कर की आत्महत्या' बस इतनी सी थी यह खबर, उसके बाद अगले दो-तीन दिन तक मीडिया में यह खबर टॉप बैंड पर बनी रही और उसके बाद ये चैप्टर बंद हो गया।

मगर तारीख 25, जुलाई 2020 को ये चैप्टर फिर खुला जब सुशांत के पिता के.के सिंह ने पटना के राजीव नगर थाने में 'रिहा चक्रवर्ती' के खिलाफ FIR दर्ज कराई।
बस फिर तो मीडिया ने सर पे कफन बांधा और 'Justice for SSR' का नेमप्लेट लगाकर सुशांत नाम की गाड़ी चलाना शुरु कर दी और इंसाफ की मंजिल तक पहुंचने का तय कर लिया, चाहे फिर रास्ते में जो आए। आइए आपको बताते हैं यह सफर कैसा रहा-
रंग बिरंगे हेडलाइंस चले 'रिहा का काला जादू', 'दगाबाज रिहा', 'झूठी रिहा', 'नशेड़ी रिहा', 'ड्रगी रिहा और ना जाने क्या क्या। सबसे पहले रास्ते में चेकिंग लगी ED की, जहां सुशांत नामक गाड़ी की जांच हुई, थोड़ा बहुत मामला गड़बड़ निकला मगर गाड़ी को आगे जाने दिया, फिर CBI की चेकिंग लगी, लंबी जांच पड़ताल चलने लगी, रिहा के साथ-साथ बहुत से लोग जेल भी गए। 'कंगना राणावत' तो इस गाड़ी की बहुत पहले से 'को-कंडक्टर' बनी हुई थी, रास्तों में उन्होंने खूब सुर्खियां बटोरी, ईतनी सुर्खियां बटोरी कि अपना ऑफिस ही तुड़वा बेठी, कुछ दिनों के लिए नेमप्लेट बदला 'Justice for SSR' से नेमप्लेट Justice for kangna' हो गया। फिर गाड़ी की रफ्तार रास्ता भटकने के कारण धीमी पड़ने लगी, तो नेताओं ने कहा, 'इंसाफ की मंजिल मिले ना मिले गाड़ी को बिहार घुमा लो' अब ये तो आप सब को पता ही है, बिहार में क्या है इस वक्त। इसी दौरान बीच रास्ते में 'बेरोजगारी' आई मीडिया वालों ने सुशांत की गाड़ी से उसे कुचल दिया, 'भीषण आर्थिक मंदी' आई उसे भी कुचल दिया, 'कोरोना का बढ़ता दर' और 'लोगों की मौत' इसे भी कुचल दिया, 'युवाओं का रोजगार को लेकर तगड़ा विरोध प्रदर्शन' इसे भी कुचल दिया, कोई नहीं चला। अब अंत में भटकते-भटकते सुशांत की गाड़ी जा पहुंची 'ड्रगीवुड' जहां लगी थी NCB कि चेकिंग। इस चेकिंग में किन-किन के नाम सामने आए वह तो आप भली-भांति जानते ही होंगे, मगर अफसोस की बात यह रही कि आखिरकार मीडिया सुशांत की गाड़ी को इंसाफ की मंजिल तक नहीं ही पहुंचा पाई। खूब मेहनत की, खूब पसीना बहाया, खूब चिल्लाया, सब बर्बाद गया, मगर एक फायदा जरूर हुआ, झोली में TRP खूब भर-भर कर आई। ऐसे में एक कहावत याद आ रही हैं, -'अपना काम बनता भाड़ में जाए जनता'।
फिलहाल आज 6,अक्टूबर 2020 एक बार फिर यही खबर है 'बॉलीवुड स्टार सुशांत सिंह राजपूत ने अपने घर में पंखे से लटक कर की आत्महत्या' मगर पहली वाली खबर लोगों को हजम नहीं हो रही थी और चूंकि अब AIIMS ने अपनी रिपोर्ट में पुष्टि कर दीया है, की सुशांत सिंह राजपूत की मौत आत्महत्या ही है, तो अब धीरे-धीरे लोग मान रहे हैं। अंत में मुझे दुख है की, कई मीडिया चैनल्स की दो महीने तक चली 'सुशांत सिंह राजपूत को इंसाफ' दिलाने की मुहिम फेल हो गई, मेरी शुभकामनाएं उनके साथ हैं।

शुक्रिया, राहुल सिंह द्वारा

Wednesday, 7 October 2020

'कोमल पुष्प-अम' बिहार की एक नई उम्मीद

बिहार में एक वह दौर था जब, 1997 में पहली बार महिला मुख्यमंत्री 'राबड़ी देवी' बनी, यह तब हुआ जब उनके पति लालू यादव को 'चारा घोटाला' के आरोप में गिरफ्तारी वारंट जारी कर मुख्यमंत्री के पद से हटाया दीया गया। इससे आप अंदाजा लगा ही चुके होंगे हैं, कि उस दौर में जब 'मुख्यमंत्री' ही भ्रष्टाचारी थे, तो पूरी राज्य सरकार कैसी रही होगी।

खैर छोड़िए, आज देश बदल चुका है, मोदी जी के संदर्भ में कहूं तो 'भारत' अब 'नया भारत' बन चुका है। वह 1997 था जब उन्हें मजबूरी में बिहार की सत्ता को संभालना पड़ा और अब 2020 है और बिहार चुनाव में एक बार फिर महिला प्रत्याशी के रूप में बिहार के दरभंगा जिले की बेटी 'पुष्पम प्रिया चौधरी' मुख्यमंत्री पद के लिए अपनी दावेदारी 8, मार्च 2020 को घोषित कर चुकी है। एक मिनट अगर आप इसकी तुलना राबड़ी देवी से कर रहे हैं, तो यह बिल्कुल गलत होगा।
लंदन के इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेंट स्टडीज, यूनिवर्सिटी ऑफ ससेक्स, यूके और पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन के लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स एंड पॉलिटिकल साइंस से डेवलपमेंट स्टडीज में एमए के साथ सशस्त्र कर चुकी पुष्पम प्रिया चौधरी ने अपनी पार्टी 'प्लूरल्स' बनाकर बिहार चुनाव के रेस में अकेले दौड़ने वाली हैं। हालही में उन्होंने अपने 40 उम्मीदवारों की पहली सूची भी जारी कर दी है और आगे 32 अन्य उम्मीदवारों की लिस्ट जल्द ही जारी कर दी जाएगी। हालांकि वह खुद 2 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ेगी पहला मधुबनी जिले के 'बिस्फी' से और दूसरा 'मगध' क्षेत्र से। गौर करने वाली बात यह है की उम्मीदवारों के 'जाति' वाले 'सेक्शन' में 'प्लूरल्स पार्टी' ने उनके प्रोफेशन का जिक्र किया है। पार्टी के उम्मीदवारों में डॉक्टर, इंजीनियर, प्रोफेसर, टीचर, सोशल एक्टिविस्ट, वकील, बिजनेसमैन, किसान और गृहिणी शामिल है। ऐसे में अगर बिहार में 'प्लूरल्स पार्टी' की सरकार बनती है, तो यह 'जातिवाद' को कम करने और साक्षरता को बढ़ाने की एक अच्छी पहल साबित हो सकती है। क्योंकि बिहार में 'जातिवाद' चरम पर है, करीब 80% लोग बिहार में मतदान आज भी प्रत्याशी के 'जाति' के आधार पर ही करते हैं। पार्टी के कई तरह के दमदार 'टैगलाइन' है, जैसे कि "Love Bihar, Hate Politics" और “आप सीढ़ी पर चढ़ने पर ध्यान केंद्रित करें और हम सांपों से निपटते हैं”। इस तरह के हटके 'टैगलाइंस' को देखकर एक नई सोच और नई उम्मीद की किरण नजर आती है बिहार में।
फिलहाल इनके पिता की बात करें तो 'विनोद चौधरी' JDU के अतितकालीन MLC रह चुके हैं और दरभंगा के लेहरियासराय मैं दो दशकों से पत्रकार भी रह चुके हैं। बेटी के विधानसभा चुनाव लड़ने पर चौधरी जी का कहना है, कि वह वयस्क और शिक्षित हैं यह उनका फैसला है। मगर BJP-JDU, RJD-Cong, LJP-BJP जैसे महागठबंधन वाले कांटों में क्या अकेली 'प्लूरल्स पार्टी' की 'कोमल पुष्प-अम' खिल पाएंगी, यह तो परिणामों के घोषणा के बाद ही पता चल पाएगा। 
अंत में जाते-जाते आपको एक बात बताते जाते हैं, सुनने में आया है की अगर 'पुष्पम प्रिया चौधरी' जीतती है तो बिहार को 2030 तक यूरोप में तब्दील कर देंगी यह उनका वादा है। अब  आप इसे मजाक भी समझ सकते हैं और नहीं भी, तय आपको करना है।

नमस्कार, राहुल सिंह द्वारा

Tuesday, 6 October 2020

इस बार नहीं बरसेगा माता का आशीर्वाद 'आत्मनिर्भर भारत' पर

 सुंदर-सुंदर पंडाल, ऊंची-ऊंची दुर्गा माता की प्रतिमा, धूप-अगरबत्ती की चारों ओर फैली मनमोहक सुगंध, कान में बजते भजन, लोगों की भीड़, रंग-बिरंगी दुकाने और हर दो कदम पर ठेले वालों की गूंजती आवाज आइए 50 रुपए,..! आइए 100 रुपए,..! कोई गुब्बारे बेचता, तो कोई चूड़ियां बेचता, तो कोई खिलौने बेचता। ठीक ऐसा ही हर साल देखने को मिलता था दुर्गा पूजा के महापर्व पर।
मगर इस साल कोरोना वायरस के समय में यह सब कल्पना बनकर रह जाएंगे। क्योंकि हालही में भोजपुर जिला के SDM ने ये ऐलान किया हैं, की भारत सरकार द्वारा कोविड-19 के सुरक्षात्मक उपाय आदर्श आचार संहिता के अनुसार ही कोई भी पर्व मनाया जाएगा, उन्होंने कहा गणेश चतुर्थी, मुहर्रम, रामनवमी इत्यादि को संयमित तरीके से मनाया गया है, तो अब दुर्गा पूजा को भी संयम के साथ मनाना है। महामारी को देखते हुए पंडाल लगाकर मूर्तियां बैठाने की अनुमति नहीं होगी जिन्हें मूर्तियां स्थापित करनी है, वह अपने घरों में इसका आयोजन कर सकते हैं। इसके अलावा 'चेहल्लुम' जो कि एक मुसलमानों का त्यौहार है इस पर भी किसी प्रकार का जुलूस नहीं निकाले जाएंगे।
लीजिए एक तरफ जहां मोदी जी आत्मनिर्भर भारत के तहत MSME का कल्याण करना चाहते हैं, तो वही कोरोना वायरस हर बार बीच में टांग अड़ा ही देता है।
आइए जानते हैं किस-किस के पेट पर लात पड़ेगी दुर्गा पूजा के आयोजन ना होने से,
जैसा कि मैंने शुरूआती में जिक्र किया 'सुंदर-सुंदर पंडाल' ये लगाने वाले उन सभी ठेकेदारो की आमदनी इस बार नहीं होगी। ऊंची-ऊंची दुर्गा माता की प्रतिमा बनाने वाले उन सभी मूर्तिकारो की पेट इस बार कटने वाली हैं। जब मूर्तियां नहीं होगी तो पूजा भी नहीं होगी और पूजा नहीं होगी तो धूप, अगरबत्ती की खरीदी में गिरावट आएगी परिणाम स्वरूप कुटीर उद्योग कंपनियों को बड़ा घाटा सहना पड़ सकता है। माता की मूर्ति के सजावट में तमाम तरह की चीजों का उपयोग होता है जैसे की चुनरी, कपड़े, माला, कागज, रंग बिरंगी लाइट आदि इन सब का उत्पादन कुटीर उद्योगों द्वारा पूजा के दो-तीन महीने पहले से ही शुरू हो जाता है, मगर इस बार यह उम्मीद कम नजर आ रही है।
और सबसे बड़ी मार उन लघु उद्योगपतियों को झेलनी पड़ेगी जो छोटे-छोटे खिलौने, चूड़ियां, माला, झूमके, मूर्तिया आदि वस्तुएं ठेलो पर सजा कर बेचा करते थे।
हर किसी को त्योहार, पर्व का इंतजार रहता है, क्योंकि ऐसे बड़े पर्व, छोटे बड़े व्यापारियों के लिए एक अच्छा कमाई का साधन प्रतीत होते हैं, मगर अफसोस इस बार यह सब कुछ संभव हो पाना मुश्किल है।
मगर वहीं दूसरी ओर हम इसके अच्छे परिणामों की बात करें, तो यह कहना गलत नहीं होगा कि जिस समय भारत कोरोना वायरस से अपने एक लाख से भी अधिक लोगों की जान गंवा चुका है, और 66 लाख से अधिक लोग इससे संक्रमित हैं, तो ऐसे में यह कदम सराहनीय साबित होगा, क्योंकि जब तक वैक्सीन नहीं निकलती तब तक हमें इस तरह चेतावनी के साथ काम करना पड़ेगा, और यह पहली बार नहीं है, इससे पहले भी कई विशाल पर्व संयम के साथ मनाए जा चुके हैं। अंत में मैं बस यही कहना चाहूंगा की जरूरत है, हमें इस वायरस को फैलने से रोकने की और लोगों की जान बचाने की, क्योंकि जब जान होगा तो यह जहांन होगा इसीलिए 'जब तक कोरोना है, घरों में रहना है'।

नमस्कार, राहुल सिंह द्वारा

Wednesday, 22 July 2020

मेरे मन कि आवाज

इसे आप लोग पूरा पढ़ेंगे या नहीं उससे मुझे कोई मतलब नहीं, मगर मैं जो लिखने जा रहा हूं वह मेरी अंतरात्मा की आवाज है।
पता है, सबसे ज्यादा अफसोस कब होता है जब आप किसी से उम्मीद लगाते हैं पर वह आपकी उम्मीदों को नजरअंदाज कर दे, आपकी उम्मीद पर खरा ना उत्तरे, तब होता है सबसे ज्यादा अफसोस। जब आपके परिवार के साथ या आपके साथ कुछ गलत होता है तब सबसे ज्यादा आपकी उम्मीदें किस से होती है पुलिस प्रशासन से। मगर जरा सोचिए एक आम इंसान भला क्या कर लेगा अगर येही आपकी मदद ना करें तो, कुछ कर लेंगे क्या।
पता है दिक्कत क्या है। इस कलयुग में किसी भी लड़की को छेड़ना, उसे गाली देना या अभद्र भाषा का प्रयोग करना यह सब एक आम बाते हो चुकी है, यह सब चलता है, पुलिस को भी यही लगता हैं तभी पुलिस इनके खिलाफ कोई कारवाई नहीं करती और होता क्या है, वह सभी मनचले लड़के जो यह करते हैं उनको बढ़ावा मिलता है और परिणाम में वह कल को निर्भया, कठुआ, प्रियंका रेड्डी जैसे कांड करते हैं। अगर आप भी 'लड़की छेड़ना' और 'लड़की का रेप होने' में फर्क ढूंढते हैं तो कसम से आप भारत में रेप को कभी रोक नहीं पाएंगे। मगर चुक कहां हो जाती है, वही हो जाती है जहां पुलिस फर्क ढूंढने लग जाती है 'लड़कियों को छेड़ने' जैसी बात को एक छोटा अपराध समझ बैठती हैं, और 'रेप' को एक बड़ा अपराध।
एक साल पहले की बात है, उत्तर प्रदेश के 'गाजियाबाद' में एक पत्रकार जिसका नाम 'विक्रम जोशी' था, उसकी बेटियों को कुछ आवारा मनचलों ने छेड़ा, विक्रम ने थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई और उम्मीद लगा कर बैठे की पुलिस प्रशासन कुछ ना कुछ तो करेगी, मगर उसे यह नहीं पता था की पुलिस के लिए यह एक आम बात है। एक साल बीत गया मनचलों की हिम्मत बढ़ी और उन्होंने विक्रम की बेटियों को फिर छेड़ा घर के पास गाली गलौज की। एक बार फिर विक्रम ने पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई, मगर फिर पुलिस चुप रही। विक्रम उम्मीद लगाकर बैठे रहे। मगर मनचलों की हिम्मत इस बार कुछ इस प्रकार बढ़ी कि उनके इरादे कुछ ऐसे थे।
"हम तुम्हारी बहन, बेटियों को छेड़ेंगे, उन्हें गालियां देंगे, गंदी गंदी बातें कहेंगे मगर तुम विरोध मत करना यह सब हम तुम्हारे सामने करेंगे, तुम्हारे घर में घुसकर करेंगे मगर तुम विरोध मत करना अगर करोगे तो" !!
दिनांक 20 जुलाई रात के करीब 10 बजकर 30 मिनट के पास 'विक्रम जोशी' को उन्हीं मनचलों ने उसही के घर के पास सड़क पर उसकी मोटरसाइकिल रोककर उसही की बेटियों के सामने उसे पीटा और सर में गोली मार दी।
अफसोस सिर्फ इस बात का है, की जितनी हिम्मत यह मामूली गुंडे दिखाते हैं ना, उतनी ही हिम्मत पुलिस दिखाने लग जाए तो, आज दुनिया के कई बड़े बड़े अपराध होने से बच जाए। यह बहुत बड़ी बात कह दी मैंने, जबकि हकीकत इससे बहुत परे है। हकीकत में पुलिस इंतजार करती है, खून बहने का, आंसू बहने के और फिर गिरफ्तार करती है। अंत में गया किसका, पुलिस का,,?? 'कुछ नहीं',, आपका गया सब, अब थोड़ा आसु बहाईए, एक मिनट कहीं आपको "System" पर गुस्सा तो नहीं आ रहा, अच्छा ये लीजिए 'दस लाख' रखिए जेब में, और खुश रहिए। और हां,, खबरदार जो "System" बदलने की कोशिश की तो, वो तुम्हारे औकात के परे है।

नमस्कार, राहुल सिंह द्वारा