उसने 'कमीज' के अपने ऊपर के दो बटन खोलें, बाजुओं को जरा ऊपर सरकाया, कंधे पर गमछा रखा और हल्का झुककर, पांचों उंगलियों को सीमेंट की बोरी के नीचे लगाया और एक झटके मैं बोरे को कंधे पर लाद लिया और चल पड़ा मकान के काम पर। दूसरे ने गमछे को 'गोल बनाकर' अपने सिर पर रखा और ईटों की ढेरी में से एक-एक कर पांच ईंटे अपने सिर पर लाद लिए और दबे पाव मकान की ओर बढ़ चला, कि तभी पीछे से आवाज आई 'चाय' मैं पीछे मुड़ा तो काम वाली बाई 'चाय' लेकर खड़ी थी, मैंने चाय ली और फिर खिड़की से बाहर उन मजदूरों का नज़ारा देखने लगा, हर रोज की तरह उन मजदूरों के पास से वो औरत पानी का मटका अपने कमर पर रखकर ले जाती, वो मटका उसके कमर से खिसकता वह फिर से ऊपर चढ़ा लेती, कि तभी पीछे से आवाज आई 'साहब झाड़ू लगा दूं' मैं पीछे मुड़ा और सर को हिलाकर हामी भरी। मैंने देखा उसने झाड़ू को कस के पकड़ा और सरपट सभी कमरों में झाड़ू लगा दिया। अंत में उसने फिर पूछा 'साहब कोई और काम' मैंने कहा 'तुम थकती नहीं हो क्या' उसने कहा 'नहीं साहब' और यह कहकर वह चली गई।
"आज का दिन"..........!!
उसने 'कमीज' के अपने ऊपर के दो बटन खोलें, बाजुओं को जरा ऊपर सरकाया, कंधे पर गमछा रखा और हल्का झुककर, पांचों उंगलियों को बैग के नीचे लगाया और एक झटके में बैग को कंधे पर लाद लिया और चल पड़ा। दूसरे ने गमछे को गोल बनाकर अपने सिर पर रखा और एक-एक करके दो ट्रॉली बैग सिर पर लाद लिए और चल पड़ा। मैंने गौर किया पीछे से 'चाय' की आवाज अब तक नहीं आई, मैंने नजरें खिड़की पर ही रखी, हर रोज की तरह उन मजदूरों के पास से वह औरत गुजरी मगर उसके कमर पर मटके की बजाय 'एक' साल का मासूम बच्चा था, वो बच्चा कमर से खिसकता वह फिर से ऊपर चढ़ा लेती। मैं पीछे मुड़ा सर हिलाकर हामी भरने के लिए मगर पीछे कोई ना था, मैं दोबारा खिड़की की ओर मुड़ा और मैंने देखा मेरी कामवाली बाई ने अपने 'पाँच साल' के बच्चे का हाथ कस कर पकड़ा और सरपट चलने लगी, मैंने मन-ही-मन में पूछा 'तुम थक्को गी नहीं' और जवाब मुझे मालूम था। मैं अंत में खिड़की बंद करने के लिए करीब आया कि तभी मेरे खिड़की के सामने से एक अधेड़ उम्र का बूढ़ा मजदूर 'सर पर बोरी और हाथों में बैग' लिए मुझे दिखा, मैंने चिल्लाकर पूछा "अरे सुनो",'यह बोरिया बिस्तर लेकर कहां की ओर प्रवास कर रहे हो' उसने बड़ी शिद्दत से जवाब दिया "हमने मजदूरी की है, प्रवास नहीं।
राहुल सिंह द्वारा