Wednesday, 27 May 2020

"हमने मजदूरी की है, प्रवास नहीं"

"कुछ महीने पहले"...........!!
उसने 'कमीज' के अपने ऊपर के दो बटन खोलें, बाजुओं को जरा ऊपर सरकाया, कंधे पर गमछा रखा और हल्का झुककर, पांचों उंगलियों को सीमेंट की बोरी के नीचे लगाया और एक झटके मैं बोरे को कंधे पर लाद लिया और चल पड़ा मकान के काम पर। दूसरे ने गमछे को 'गोल बनाकर' अपने सिर पर रखा और ईटों की ढेरी में से एक-एक कर पांच ईंटे अपने सिर पर लाद लिए और दबे पाव मकान की ओर बढ़ चला, कि तभी पीछे से आवाज आई 'चाय' मैं पीछे मुड़ा तो काम वाली बाई 'चाय' लेकर खड़ी थी, मैंने चाय ली और फिर खिड़की से बाहर उन मजदूरों का नज़ारा देखने लगा, हर रोज की तरह उन मजदूरों के पास से वो औरत पानी का मटका अपने कमर पर रखकर ले जाती, वो मटका उसके कमर से खिसकता वह फिर से ऊपर चढ़ा लेती, कि तभी पीछे से आवाज आई 'साहब झाड़ू लगा दूं' मैं पीछे मुड़ा और सर को हिलाकर हामी भरी। मैंने देखा उसने झाड़ू को कस के पकड़ा और सरपट सभी कमरों में झाड़ू लगा दिया। अंत में उसने फिर पूछा 'साहब कोई और काम' मैंने कहा 'तुम थकती नहीं हो क्या' उसने कहा 'नहीं साहब' और यह कहकर वह चली गई।
"आज का दिन"..........!!
उसने 'कमीज' के अपने ऊपर के दो बटन खोलें, बाजुओं को जरा ऊपर सरकाया, कंधे पर गमछा रखा और हल्का झुककर, पांचों उंगलियों को बैग के नीचे लगाया और एक झटके में बैग को कंधे पर लाद लिया और चल पड़ा। दूसरे ने गमछे को गोल बनाकर अपने सिर पर रखा और एक-एक करके दो ट्रॉली बैग सिर पर लाद लिए और चल पड़ा। मैंने गौर किया पीछे से 'चाय' की आवाज अब तक नहीं आई, मैंने नजरें खिड़की पर ही रखी, हर रोज की तरह उन मजदूरों के पास से वह औरत गुजरी मगर उसके कमर पर मटके की बजाय 'एक' साल का मासूम बच्चा था, वो बच्चा कमर से खिसकता वह फिर से ऊपर चढ़ा लेती। मैं पीछे मुड़ा सर हिलाकर हामी भरने के लिए मगर पीछे कोई ना था, मैं दोबारा खिड़की की ओर मुड़ा और मैंने देखा मेरी कामवाली बाई ने अपने 'पाँच साल' के बच्चे का हाथ कस कर पकड़ा और सरपट चलने लगी, मैंने मन-ही-मन में पूछा 'तुम थक्को गी नहीं' और जवाब मुझे मालूम था। मैं अंत में खिड़की बंद करने के लिए करीब आया कि तभी मेरे खिड़की के सामने से एक अधेड़ उम्र का बूढ़ा मजदूर 'सर पर बोरी और हाथों में बैग' लिए मुझे दिखा, मैंने चिल्लाकर पूछा "अरे सुनो",'यह बोरिया बिस्तर लेकर कहां की ओर प्रवास कर रहे हो' उसने बड़ी शिद्दत से जवाब दिया "हमने मजदूरी की है, प्रवास नहीं।

राहुल सिंह द्वारा

Sunday, 17 May 2020

शादी In Lockdown PART- 1 "ब्लडी फूल"

से पढ़ने वाले को नमस्कार, हमारा नाम 'फूल कुमार' उर्फ 'चौबे' है। आपसे अनुरोध है, कि ये जो आप आधा पढ़कर आधा छोड़ देते हैं ना, यह बिल्कुल ना करें वरना जो हमें लिख रहा है, वह आपसे नाराज हो जाएंगे।

1 जनवरी 2020, नया साल था और हमने तय कर लिया था, की भईया विवाह तो हम इसी साल करेंगे। बस फिर क्या था पंडित जी को बुलाया गया और मूहूरत तय किया गया, दिन रविवार, तारीख पहली और महिना जून का। हमने उल्टी गिनती गिनना शुरु कर दिया। मगर शनि महाराज जी ने कुंडली तो हमारी पहले ही सेट कर रखी थी, यहां कोरोना ने भारत में दस्तक दिया वहां मोदी जी ने लॉकडाउन का ऐलान किया। हमने अम्मा जी से कहीं 'जब तक लॉकडाउन नहीं खुलेगा तब तक हम विवाह नहीं करेंगे', तभी पिता जी ने भी कही 'फिर तो बेेेेटा हो-ली इस साल तुम्हारी शादी', 'देेेेखो विवाह तो तुम्हारा मुहूर्त पर ही होगा, चाहे जो हो जाए' और लड़कियां खोजना शुरू हो गए, बड़ी मशक्कत के बाद एक लड़की के परिवार वालों से मिलने का तय हुआ। चौबे खानदान की लड़की थी, नाम था "रेहाना" अत्यंत शर्मीली और संस्कारी। हम मन ही मन मुस्काए और शुरू कर दिये हनुमान चालीसा के जगह 'रेहाना' नाम जपना।
अब मिलने का तय तो हो गया था, मगर ना होटल खुला था, ना ढाबा, क्योंकि शहर लॉक डाउन था। फिर तय हुआ कि हम मंगलवार को परिवार सहित पास वाली सब्जी मंडी में मिलेंगे।
 दिन मंगलवार, मैं, मेरे पिताजी, अम्मा और साथ में छोटा भाई, हाथों में झोला, मुंह पर मास्क और पैरों में हवाई चप्पल पहन कर निकल पड़े। हमने उस दिन नंदू भाई के ठेलें वाली खास जींस डाली थी। वो भी अपने मां-बाप और छोटी बहन के साथ आ रही थी।
सब्जी मंडी में पहुंचते ही उसके पिता ने फोन किया 'हम पास की सब्जी मंडी में पहुंच चुके हैं', मेरे पिताजी ने कहा 'हम भी'। अब एक दूसरे को, तो ना हमने देखा था ना उन्होंने और शुरू हुआ 'खोजने का काम'।
मैं हर लड़की को पैनी नजरों से घूर-घूर कर देखू और लड़कियां मुझे देख के मुंह घुमा ले, बड़ा मुश्किल था। मगर इसी क्रम में देखते-देखते एक लड़की से मैं टकरा जो गया, बस फिर क्या था, उसका हाथ और मेरा गाल, "दीया घुमा के"। उस लड़की के पापा मम्मी सब आ गए, मगर मेरे पिता जी, वही खैनी की दुकान पे खैनी मल रहे थे, अम्मा हमेशा की तरह तोरी वाले से लड़ रही थी और छोटा भाई लउनडियाबा....,, खैर छोड़िए। उस लड़की का बाप बोला 'क्या हुआ रेहाना बेटा, क्या हुआ' और लड़की ने जवाब दिया 'पता नहीं ये लफंगा, देहाती, गवार लड़का मेरे से आकर टकरा गया' और अंत में उसने अंग्रेजी के जो दो शब्द कहे "ब्लडी फूल", वह मेरे दिल को ऐसे चुभे मानो 'दिल के अरमा.....,, खैर छोड़िए आपको तो पता ही है। मैंने अपने पिता जी से कहा, 'लड़की देख ली हैं तुरंत घर चलिए' पिताजी ने कहा 'कब, हमें भी तो दिखाओ' हमने कहीं 'विवाह आपको करना है या हमें', और हम सब घर आ गए।
मैंने पिताजी को कोने में लेते हुए पूछा,'आपने तो कही थी लड़की शर्मीली और संस्कारी हैं' पिताजी ने जवाब दिया 'बिल्कुल इसमें कोई शक नहीं, चौबे खानदान की शान है' फिर फुस-फुसाते हुए उन्होंने मुझसे पूछा,'तुम्हें कैसी लगी रेहाना' मैंने लंबी सांस ली और दृश्य याद करते हुए कहा "ब्लडी फूल"

अब देखना यह है, की 'फूल कुमार' क्या 'रेहाना' से शादी करेगा या फिर उसे मना कर देगा।

बहुत-बहुत शुक्रिया, अगला पाट बहुत जल्द।
राहुल सिंह द्वारा

Sunday, 10 May 2020

#मैंने मच्छरों में इंसान को तड़पते देखा है।

बुध पुर्णिमा से एक दिन पहले की वो रात थी, मेरे घड़ी में रात के 9 बज रहे थे, और टीवी में चौधरी जी का DNA चल रहा था, हमेशा की तरह वह खबरों को संप्रदायवाद के तेल में तलने का काम कर रहे थे और मैं रोटी में बैगन का भरता भरकर दही में डुबोकर साथ में आम का अचार भी खा रहा था। वो एक एक निवाला मेरे जीब को स्वाद दे रहा था, मगर चौधरी जी का DNA आज कुछ खास ना लग रहा था। मैंने खाना खत्म किया और आधे पे ही टीवी बंद कर दिया। माँ ने आखिर में दूध भी थमा दिया, मैंने बड़े ही मुश्किल से दूध को भी अपने पेट में थोड़ी जगह दे दी और चल पड़ा अपने बिस्तर की ओर। मेरी अक्सर रात में लाइट जलाकर सोने की आदत है, उस रात मच्छर बहुत थे, मैंने कीड़े और मच्छर मारने वाला स्प्रे अपने रूम में स्प्रे किया और कुछ देर बाद सोने की कोशिश की, क्योंकि बैगन का भरता और रोटी मेरे पेट में आपस में लड़ाई कर रहे थे, दूध और दही आपस में मिलकर रह रहे थे और आम का अचार इन सब का लुफ्त उठा रहा था। बड़ी मुश्किल से मुझे नींद आई मगर फिर रात के ठीक 3 बजे मेरी आंख खुली, मैं फिर सोने के लिए करवट बदलने लगा की तभी मेरी नजर जमीन पर पड़ी, मैंने देखा कई सारे मच्छर उस स्प्रे के कारण जमीन पर तड़प रहे थे, ऐसे लग रहा था जैसे वह सांस के लिए तड़प रहे हो, कुछ थोड़ा बहुत उड़कर गिर जा रहे थे, हर मच्छरों के चारों तरफ चीटियां लगी हुई थी, और जो मर गए थे उन्हें चीटियां उठाकर ले जा रही थी, ऐसा लग रहा था जैसे मानो वो मच्छर मुझसे मदद मांग रहे हो, मगर मैं उनको बचा ना सका। एक मिनट आप कही इमोशनल तो नहीं हो गए, अरे मच्छर थे वो, इंसान नहीं। मैं फिर से सो गया और सुबह उठते ही पहले मैंने अपने पेट से उन शरारती तत्वों को बाहर निकाला। घड़ी में सुबह के ठीक 9 बज रहे थे और टीवी में चौधरी जी तो नहीं आ रहे थे, मगर कुछ खबरे आ रही थी, ठीक वैसी ही जो कल रात मैंने 3 बजे देखा। आंध्र प्रदेश के वेंकट पुरम के पास ठीक 3 बजे सटाईरिन (styarin) गैस लीक हुई, कई सारे लोग उस गैस के कारण जमीन पर तड़प रहे थे, ऐसे लग रहा था जैसे वह सांस के लिए तड़प रहे हो, कुछ थोड़ा बहुत चल कर गिर जा रहे थे, हर लोगों के चारों तरफ स्वास्थ्य कर्मी लगे हुए थे, और जो मर गए थे उन्हें स्वास्थ्य कर्मी उठाकर एंबुलेंस में ले जा रहे थे, ऐसा लग रहा था जैसे मानो वो लोग मुझसे मदद मांग रहे हो, मगर मैं उनको बचा ना सका। एक मिनट कहीं आप फिर से इमोशनल तो नहीं हो गए, अरे इंसान थे वो, मच्छर नहीं, इमोशनल होइए। उस रात मैंने उन मच्छरों में इंसान को तड़पते हुए देखा।
आंध्र प्रदेश में गैस रिसाव के कारण मारे गए लोगों को श्रद्धांजलि और नमन।

धन्यवाद, राहुल सिंह द्वारा

Thursday, 7 May 2020

#आओ चटपटी 'खबर' पकाएं

प अगर सोच रहे हैं 'खबर' कोई स्वादिष्ट सा पकवान है, तो माफ करिएगा आप बिल्कुल गलत सोच रहे हैं। दरअसल मैं यहां किसी 'खाने' या फिर किसी 'पकवान' के बारे में बात नहीं कर रहा हूँ, मैं यहां 'खबर' अर्थात 'समाचार' जो हम टीवी में सुनते हैं, देखते हैं, उसकी बात कर रहा हूं।
तो आइए शुरू करते हैं, 'खबर' पकाने का सिलसिला,-
'चटपटी खबर' पकाने के लिए सामग्री में चाहिए- संप्रदायवाद तेल, बाइट मसाला, राजनीतिक मसाला, ट्विटर मसाला, आवाज गरम मसाला और खुद से बना हुआ कोई भी मसाला।

तो 'चटपटी खबर' पकाने के लिए सबसे पहले आपको बाहर जाना पड़ेगा, यानी की बाजार में, जहां आपको तरह-तरह की खबरें मिलेंगी जैसे- आर्थिक मंदी, गरीबी, लाचार मजदूर, बेरोजगारी, राजनीति, चुनाव, सामाजिक अपराध, चोरी डकैती, रेप, महामारी, आपदा, आतंकवादी हमला, कालाबाजारी, मॉब लिंचिंग आदि। अब आपको ऐसी खबरें उठाकर लानी है जिसको लोग अधिक से अधिक देखना पसंद करें, यानी कि जिससे TRP बड़े। अब अधिकतर मीडिया को सबसे ज्यादा राजनीतिक, चुनाव, आतंकवादी हमले, सामाजिक अपराध, चोरी-डकैती, रेप, मॉब लिंचिंग जैसी खबरें ही पसंद आती है।
अब शुरू होता है खबरों को पकाने का काम। मान लीजिए आप कोई भी 'खबर' को पकाना चाहते हैं, तो उसके लिए सबसे पहले आपको संप्रदायवाद तेल में 'खबर' को अच्छे से तलना पड़ेगा, अच्छे से तलने के बाद उसमें राजनीतिक मसाला डालिए, ध्यान रहे राजनीतिक मसाला अगर आप 'कांग्रेस' कंपनी का डालेंगे तो खबर ओर भी ज्यादा चटपटी बनेगी। इसके बाद ट्विटर मसाले का डब्बा खोलिए, उसमें आपको तरह-तरह के बयान मसाले मिलेंगे, आपको जो सबसे ज्यादा विवादित बयान लगे उसे आप उठा कर डाल दीजिए, फिर आप अगर खबर का चटपटा पन ओर बढ़ाना चाहते हैं तो उसमें किसी बड़े नेता का 'बाइट मसाला' डाल दीजिए। और अंत में आप अपने खबर को 'आवाज गरम' मसाले के साथ चैनल प्लेट मैं परोसीए और स्वाद में फिर भी कोई कमी रेह जाए, तो अपने से कोई भी मसाला बनाकर डाल दीजिए, हालाकि यह मसाला नहीं डालना चाहिए।

तो चटपटी खबर बनाना तो आप सीखे गए होंगे मगर आपसे एक सवाल, खबर को आप कच्चा देखना पसंद करते हैं या फिर उसे पका हुआ देखना पसंद करते हैं, उम्मीद करता हूं आप खबरों को कच्चा ही देखना पसंद करते होंगे, यानी कि जो खबर जैसी है वैसी ही दिखाइ जाए, हां मैं ये नहीं कह रहा कि खबरों में मसाला बिल्कुल मत लगाइए, लगाइए मगर थोड़ा कम। और बाजार से खबरें वह लाइए जो लोकतंत्र के पेट के लिए जरूरी हो, ना कि आपके(मीडिया) पेट के लिए।
अंत में यही कहना चाहूंगा, खबरों को पकाइए मत उसे जैसा है वैसा ही लोकतंत्र के सामने परोसीए।
नोट:- BJP वालों के लिए 'खबरें' थोड़ा कम बनाया करें,
'आवाज गरम मसाले' का प्रयोग तो बिल्कुल ना कर।

धन्यवाद, राहुल सिंह द्वारा

Wednesday, 6 May 2020

#मेरा ब्रेकअप और लॉक डाउन

बड़ी जिद्दी थी वो, जो चाह लेती थी वह मुझसे करवा कर ही मानती थी, उसके फरमाइशो की कोई सीमा ना थी, और यूं ही एक दिन मुझे उसका फोन आया और उसने फरमाया, बेबी आज शाम को कहीं बाहर खाना खाने चलें, उसका इतना सा यू कहना और इस पर मेरा ना कर देना ऐसा तो हो सकता नहीं था, मैंने कहा अच्छा ठीक है एक बात तो सुनो, इतने पर ही उसने मेरा फोन काट दिया। 
बस फिर क्या था 5 बजे की वो शाम थी सूरज ढलने की राह पर था, वो और मैं खाने की टेबल पर बैठे एक दूसरे को बस टक-टकी लगाए देखी जा रहे थे, ना वो कुछ बोल रही थी और ना मैं। उसके प्लेट में पाँच पानी-पूरीया थी और मेरी थाली खाली थी बगल में एक चम्मच और प्याली रखी हुई थी। तभी मुझे वो बात याद आई जो मैं उससे फोन पर कहना चाहता था मैंने बोला अच्छा सुनो, इतने पर ही उसने बोला चुप रहो, मुझे अब पानी-पुरी खाने दो। उसने खाना शुरू किया कि तभी पुलिस आ गई, मैंने पुलिस को देखा और हाथों में चम्मच उठा लिया, पुलिस ने मुझे देखा और हाथों में डंडा उठा लिया, फिर मैंने पुलिस को देखा और दूसरे हाथ में अपनी थाली उठाली और चम्मच से थाली को पीटने लगा पर फिर पुलिस ने मुझे देखा और डंडा उठाया और वो मेरी गर्लफ्रेंड को पीटने लगा।
बस फिर क्या था, वह 5 बजे की शाम मेरी जिंदगी के लिए ब्रेकअप की शाम साबित हो गई। और आज मैं लॉक डाउन में बैठा उसके लिए अफसोस करता हूं कि काश उसने मेरी बात सुन ली होती जो मैं फोन पर कहना चाहता था, कि वह तारीख थी रविवार 22 मार्च की और दिन था जनता कर्फ्यू का।
शुक्रिया शुक्रिया
सीख:- लड़कियों को ज़िद थोड़ी कम करनी चाहिए

राहुल सिंह द्वारा....